(मधुकथा 260225) 19:45
जाने अनजाने हर जीव जगत (य+गत) आकर अपने जनक को जानना समझना चाहता है। हर सृजित प्राण सृष्टि के सुर लय में ताल मिलाकर अनन्त सुख के सरोवर में स्नान करता सृष्टा बनने की एषणा लिए है। जिन्हें आध्यात्मिक साधना सीखने का सुयोग मिला है वे योग ध्यान तंत्र आदि द्वारा परम तत्व को समझने और उससे एकाकार होने का प्रयास करते हैं। वस्तुत: सृष्टा भी पितावत अपनी संततियों को स्वयं से भी अनन्त गुना अधिक उन्नत होते देखने को इच्छुक व प्रचेष्टित हैं। वे सृष्टि की सारी सम्पदा व सुविधाएँ अपने हर प्राण को देना चाहते हैं। पर जैसे ही जीव शिव की ओर चलता है, प्राय: वह मार्ग में प्राप्त सम्पदा व सिद्धियों के मोह में उलझ अपने गंतव्य से भटक जाता है। फिर भी हर साधक जीवन में साधना करता साध्य तक पहुँचने की प्रचेष्टा और प्रक्रिया में है। भक्ति, ज्ञान, कर्म, योग, तंत्र आदि उसके अवयव, उपकरण, आलम्बन व अवस्थाएँ हैं। कभी-कभी परम आत्मीयता में आ जगत के कोई सहयात्री हमसे परम तत्व के मर्म व धर्म को सहज भाव से प्रकट कर देते हैं पर हमारा मन हमारी उस अपनी अपरिपक्व मानसाध्यात्मिक अवस्था में उस तत्व के रहस्य को समझ नहीं पाता। वह चरम सत्य हो सकता है पर हम अपनी आत्म चेतना की उस अवस्था में उस परमात्म तत्व को पहचान नहीं पाते। जीवन में कहीं जड़ता नहीं है, सतत पलती पनपती पगती चैतन्यता है। हर पल हर स्तर के बाद अगला स्तर है। कुछ भी स्थायी नहीं, निरंतर गतिशीलता है। जब तक जीव अपनी परमात्मीय अवस्था नहीं पा लेता उसे चाहे अनचाहे चलते ही रहना है। मार्ग है, हैं और वे मंजिल पर ले जाने के लिए ही है। देह, मन हैं, जगत है, साधना है, आचार्य व गुरु हैं, हमारी आत्मा है, पर ये सब माध्यम मात्र हैं और उन सबने अंतत: छूट जाना है। अंततोगत्वा जब हम अपने उस परमात्मीय स्वरूप से मिलेंगे तो यह प्राकृत जगत विलुप्त हो जाएगा और हम आप्लुत हो जाएँगे परम-आनन्द में। तब इस जगत की छवि छायावत लगेगी; अपेक्षित सत्य, सापेक्ष सत्ता और परम तत्व से प्रबंधित व निदेशित प्रयोगशाला। सृष्टि में जीव को न किसी से चिपकना है, न कुछ उसके लिए गुप्त है, और न सुप्त, न कुछ पकड़ना है, न छोड़ना है, बस समझना है। उसे केवल अनुभव व अनुभूत करना है, दृष्टा बनना है और दृश्यों को देखकर चलते जाना है। ऐसा इसलिए क्योंकि वे हमारी आत्मा की ही देश काल में परिलक्षित परिस्थितियाँ व झाँकियाँ हैं, और वे पात्र के परम पुरुष से एक हो जाने के बाद गौण हो किसी और रूप, रस, विधा और सौंदर्य में प्रकट हो दृष्ट होंगी। जीवन में जन्म के बाद हर पल परमात्मा स्वयं माता-पिता, शिक्षक-आचार्य, मित्र-शत्रु, जगत में अनन्त पात्र बन हमें पालते-पोसते, सँवारते, सुधारते, सुझाते, हँसाते-रुलाते और सुख-दुख देते चल रहे हैं। वे ही आनन्द (परम सुख) देते, गुरु या शिष्य बनते, दीक्षा देते- लेते और देह, मन, वैभव, क्षुधा, विधा, विद्या, विनय, शक्ति, सिद्धि और भक्ति देते-लेते चलते हैं। जब हम किसी आभोग से चिपकते हैं तो वे उसे छुड़ाकर दूसरा आभोग का खिलौना पकड़ाकर हमारे मन को चुपके-चुपके मुस्कुराकर देखते चलते हैं। परम पुरुष चाहते हैं कि हम मात्र उन्हें देखें, उनके जगत के खिलौनों, आचार्यों-गुरुओं, झोंपड़ियों या अट्टालिकाओं को नहीं; वरन उनके आत्मीय शून्य को निहारें जहाँ से सब नि:सृत है, निर्झर है, जहाँ से सृष्टि का उद्गम है, प्रवाह है और विलय है। यदि उन्हें देख लिया तो सब दिख जाएगा, विश्व वैचित्र्य, द्वैत, दुविधा, संशय, मोह, भय, अहं और बहम सब स्पष्ट हो विदा हो जाएगा। इसलिए किसी जीव का कोई एक विशेष मार्ग नहीं हो सकता, जिस दिशा, जिस पथ व रथ, जब भी, जैसे भी वे उसके उर में जो सुर दें, जो बोधि में बोलें, उस पर चल पड़ें। सारा विश्व, सब मार्ग उनके हैं, वे जहाँ ले जाएँ, जैसे ले जाएँ, चल पड़ें। वे अपने पास ले जाएँ, वही गंतव्य है, कर्तव्य है, वही यथार्थ है। परम पुरुष का न कोई स्थान (देश) है, न कोई रूप है, न कोई अपना-पराया है और न कोई पता है। वे ब्रह्माण्ड के हर कण-गण में प्रकटे या छिपे हैं। जहाँ आवश्यकता होती है प्रकट हो जाते हैं, कभी भी कहीं भी चल देते हैं। किसी के भी मन से वत्सवत खेल लेते हैं, रुला देते हैं या हँसा देते हैं। कभी वे परम पिता बन जाते हैं तो कभी बाल बन जीव की गोद में खेल लेते हैं। वस्तुत: वे कुछ हैं भी नहीं, जीव के चित्त के उठाने के लिए जो कुछ करना होता है वे कर लेते हैं, उनका अपना कोई उद्देश्य नहीं। वे सृष्टि में सतत संतुलन, साम्य, सौंदर्य बनाते, प्रमा में रखते व समग्र प्रवाह देते चलते हैं। सृष्टि के हर कण को उत्तरोत्तर उत्कृष्ट सृष्टा बनाना ही उनका कर्म व धर्म है। इसी प्रक्रिया में ज्ञान, ध्यान व भक्ति की कितनी लहरें, बहारें, ज्वार-भाटे, आते-जाते, सिहरते, सुगबुगाते, सुहाते, सिधाते और परम स्वरूप में मिलते चलते हैं। वे ही साध्य हैं, आराध्य हैं और वस्तुत: वे ही गुरु हैं। उनकी संगत ही सत्संगति है। साध्य अपने साधकों की साधना की अनुभूतियों का आनन्द सतत ले चलते हैं। उनके चित्तों की हर लय, आकुति, आनन्द, व्यथा और दुविधा वे हर पल जानते हैं। वे जगत व जीवों की उनसे मिलन की इस रासलीला में उठती, उमगती, उमड़ती या तिरोहित होती आत्म लहरियों का आनन्द लेते चलते हैं। साधक, साधना और साध्य अंतत: एक भाव सत्ता बन जाएँ, यही जीव और शिव दोनों की शुभेच्छा है।
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
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