Wednesday, March 4, 2026

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गिनती के दो-चार सुने थे…!

गिनती के दो-चार सुने थे, अर्जुन-कृष्ण की बातों को…!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
टिम-टिम करते तारों जैसे, जीवित हैं सब लोग यहाँ
अंगारों की धधक प्रखरता, तजे बुझे से लोग यहाँ
जालसाज, गुटबाज़, धूर्त जन, स्वीकारें अपराधों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
सच्ची नीतियाँ, ध्वस्त हवेली की ईंटों सी बिखर रहीं
मर्यादा, निर्मलता अब भी, सभ्य समाज से गुजर रही
प्रमुखता से, बड़ा कारगर, मानें घात-प्रतिघातों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
अपनापन तजकर थोडे़े से, हुए धनी भी तो कम है
मिल-जुलकर जीवन जीना, सभ्य समाज का दम है
लोभ, स्वार्थ, तृष्णा फैलाती, असुरों की जज़्बातों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
सुनता हूँ मदिरा का सेवन, पीर, द्वेष और मर्ज हरे
पुरुष श्रेष्ठ उपहार सृष्टि का, नाहक ही कमज़र्फ डरे
क्यों नहीं चक्रव्यूह में जाकर, ललकारे उन्मादों को?
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
धर्म, सत्य, निष्ठा को झुकाना, अवसर एक मियादी
धर्म, सत्य, निष्ठा को लज्जित कर बनते अपराधी
दुष्कर्मी, दुष्कर्म, खोखला करते हैं बुनियादों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
-जोहन पाल, ओपीएम अमलाई
मो. 7974025985

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गिनती के दो-चार सुने थे…!

गिनती के दो-चार सुने थे, अर्जुन-कृष्ण की बातों को…!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
टिम-टिम करते तारों जैसे, जीवित हैं सब लोग यहाँ
अंगारों की धधक प्रखरता, तजे बुझे से लोग यहाँ
जालसाज, गुटबाज़, धूर्त जन, स्वीकारें अपराधों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
सच्ची नीतियाँ, ध्वस्त हवेली की ईंटों सी बिखर रहीं
मर्यादा, निर्मलता अब भी, सभ्य समाज से गुजर रही
प्रमुखता से, बड़ा कारगर, मानें घात-प्रतिघातों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
अपनापन तजकर थोडे़े से, हुए धनी भी तो कम है
मिल-जुलकर जीवन जीना, सभ्य समाज का दम है
लोभ, स्वार्थ, तृष्णा फैलाती, असुरों की जज़्बातों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
सुनता हूँ मदिरा का सेवन, पीर, द्वेष और मर्ज हरे
पुरुष श्रेष्ठ उपहार सृष्टि का, नाहक ही कमज़र्फ डरे
क्यों नहीं चक्रव्यूह में जाकर, ललकारे उन्मादों को?
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
धर्म, सत्य, निष्ठा को झुकाना, अवसर एक मियादी
धर्म, सत्य, निष्ठा को लज्जित कर बनते अपराधी
दुष्कर्मी, दुष्कर्म, खोखला करते हैं बुनियादों को!
मन में सबने ग्रहण किया है, कपटी चौसर पासों को!
-जोहन पाल, ओपीएम अमलाई
मो. 7974025985

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