(मधुगीति 251209 A) 00ः40
तिलमिला तिमिर हम गए कितने,
झिलमिला तारे कितने देखा किए;
खिलखिला पुष्प कितने झाँका किए,
हम सफ़र कितने व्यस्त ख़ुद में रहे!
हर कोई राग रंग में अपने रहे,
परिस्थिति अपनी रहे नृत्य किए;
सभी अभिनय थे सदा अभिनव थे,
उलझे किरदार अपने-अपने थे!
होड़ में जुगाड़ों में जुड़े जुड़े,
होश खोये रहे स्वत्व भूले;
तत्व दर्शी को कहाँ पहचाने,
निदेशक निकट रहे ना जाने!
बाल-वत खेल रत है हर कोई,
खेत में फसल जब कभी बोई;
जल दिया धूप वह दिया नित प्रति,
वायु औ गगन रहे सेवा रत!
तन्तु औ जंतु कितने प्रकटे रहे,
प्रचेष्टा पल-पल रह प्रौढ़ हुए;
‘मधु’ के प्रभु हर किसी को थे निरखे,
सृष्टि की हर कली को वे मेखे!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
तिलमिला तिमिर हम गए कितने!
तिलमिला तिमिर हम गए कितने!
(मधुगीति 251209 A) 00ः40
तिलमिला तिमिर हम गए कितने,
झिलमिला तारे कितने देखा किए;
खिलखिला पुष्प कितने झाँका किए,
हम सफ़र कितने व्यस्त ख़ुद में रहे!
हर कोई राग रंग में अपने रहे,
परिस्थिति अपनी रहे नृत्य किए;
सभी अभिनय थे सदा अभिनव थे,
उलझे किरदार अपने-अपने थे!
होड़ में जुगाड़ों में जुड़े जुड़े,
होश खोये रहे स्वत्व भूले;
तत्व दर्शी को कहाँ पहचाने,
निदेशक निकट रहे ना जाने!
बाल-वत खेल रत है हर कोई,
खेत में फसल जब कभी बोई;
जल दिया धूप वह दिया नित प्रति,
वायु औ गगन रहे सेवा रत!
तन्तु औ जंतु कितने प्रकटे रहे,
प्रचेष्टा पल-पल रह प्रौढ़ हुए;
‘मधु’ के प्रभु हर किसी को थे निरखे,
सृष्टि की हर कली को वे मेखे!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
