Wednesday, March 4, 2026

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धनगर लोकगीत…

पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
गोत्र-धरम में बंधा समाज,
मर्यादा का पहरेदार रे॥
भोर भई तो लाठी उठे,
भेड़-बकरी संग डगर।
जंगल-पहाड़ सखा हमारे,
मेहनत ही जीवन का स्वर॥
ऊन, दूध, घी की कमाई,
सच्चाई का व्यापार रे।
पसीने से पलता धनगर,
धरती का रखवाल रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
एक गोत्र में ब्याह ना होवे,
बुजुर्गों का ये विधान।
गोत्र जान, कुल की पहचान,
यही समाज की शान॥
मामा-बुआ का रिश्ता माने,
रक्त-संबंध सम्मान रे।
पीढ़ी बचे, वंश बचे,
विवेक का ये प्रमाण रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
ढोलक बाजे, मंगल गावे,
सादा सुथरा ब्याह।
दहेज नहीं, संस्कार भारी,
नाता बने विश्वास॥
पंच बैठें, वचन दिलावें,
दो कुलों का मेल रे।
नारी को दे आदर पूरा,
यही धनगर खेल रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
देवी-देवता, कुल-परंपरा,
वन-देव का मान।
जन्म-मरण में सामूहिकता,
दुख-सुख एक समान॥
बुजुर्गों की आज्ञा सिर माथे,
बच्चन सीखें ज्ञान रे।
लोकरीति में जीता धनगर,
संस्कृति महान रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
कागज चाहे झूठ कहे,
इतिहास सच्चा बोले।
धनगर का हर गोत्र गवाह,
अन्याय से ना डोले॥
संविधान है ढाल हमारी,
हक का सच्चा सार रे।
धनगर समाज जाग उठा,
अब ना सहन अत्याचार रे।
-गम्भीर धनगर, आगरा
मो. 9690470266

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धनगर लोकगीत…

पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
गोत्र-धरम में बंधा समाज,
मर्यादा का पहरेदार रे॥
भोर भई तो लाठी उठे,
भेड़-बकरी संग डगर।
जंगल-पहाड़ सखा हमारे,
मेहनत ही जीवन का स्वर॥
ऊन, दूध, घी की कमाई,
सच्चाई का व्यापार रे।
पसीने से पलता धनगर,
धरती का रखवाल रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
एक गोत्र में ब्याह ना होवे,
बुजुर्गों का ये विधान।
गोत्र जान, कुल की पहचान,
यही समाज की शान॥
मामा-बुआ का रिश्ता माने,
रक्त-संबंध सम्मान रे।
पीढ़ी बचे, वंश बचे,
विवेक का ये प्रमाण रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
ढोलक बाजे, मंगल गावे,
सादा सुथरा ब्याह।
दहेज नहीं, संस्कार भारी,
नाता बने विश्वास॥
पंच बैठें, वचन दिलावें,
दो कुलों का मेल रे।
नारी को दे आदर पूरा,
यही धनगर खेल रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
देवी-देवता, कुल-परंपरा,
वन-देव का मान।
जन्म-मरण में सामूहिकता,
दुख-सुख एक समान॥
बुजुर्गों की आज्ञा सिर माथे,
बच्चन सीखें ज्ञान रे।
लोकरीति में जीता धनगर,
संस्कृति महान रे॥
पहाड़ चरैया धनगर रे,
ऊन से कम्बल बुनगर रे।
कागज चाहे झूठ कहे,
इतिहास सच्चा बोले।
धनगर का हर गोत्र गवाह,
अन्याय से ना डोले॥
संविधान है ढाल हमारी,
हक का सच्चा सार रे।
धनगर समाज जाग उठा,
अब ना सहन अत्याचार रे।
-गम्भीर धनगर, आगरा
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