(मधुगीति 260203)
भटक कितने गए हैं जग-यात्री,
छूट कितने गए हैं सह-यात्री;
गृहस्थी कितने बने संन्यासी,
विरक्त कितने आए अनुरक्ति!
लगे कोई लूटने पहन चोगे,
अपने संस्कार मग रहे भोगे;
किए कर्त्तव्य लिप्त वे रहके,
मुक्त होने की युक्ति ना खोजे!
चिपक न्यासों से गए हैं कितने,
पद नहीं छोड़ पाते रह सपने;
नहीं नैतिकता शिष्टता उनमें,
धृष्टता उजागर किए जग में!
श्वाँस का ना पता है अगले पल,
छूट सब जाएगा देह घर वर;
धर्म का मर्म ही रहेगा उर,
आत्म परमात्म के जागृत भव!
दृष्टि सृष्टा की हर कोई प्राणी,
रहें उर झाँकते दिखा झाँकी;
ललक आँखों की लखे ‘मधु’ स्वामी,
सारथी रथ चलाते बन बन साक्षी!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
भटक कितने गए हैं जग-यात्री!
भटक कितने गए हैं जग-यात्री!
(मधुगीति 260203)
भटक कितने गए हैं जग-यात्री,
छूट कितने गए हैं सह-यात्री;
गृहस्थी कितने बने संन्यासी,
विरक्त कितने आए अनुरक्ति!
लगे कोई लूटने पहन चोगे,
अपने संस्कार मग रहे भोगे;
किए कर्त्तव्य लिप्त वे रहके,
मुक्त होने की युक्ति ना खोजे!
चिपक न्यासों से गए हैं कितने,
पद नहीं छोड़ पाते रह सपने;
नहीं नैतिकता शिष्टता उनमें,
धृष्टता उजागर किए जग में!
श्वाँस का ना पता है अगले पल,
छूट सब जाएगा देह घर वर;
धर्म का मर्म ही रहेगा उर,
आत्म परमात्म के जागृत भव!
दृष्टि सृष्टा की हर कोई प्राणी,
रहें उर झाँकते दिखा झाँकी;
ललक आँखों की लखे ‘मधु’ स्वामी,
सारथी रथ चलाते बन बन साक्षी!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
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