खाली-खाली क्यों बैठंू,
क्यों न सब कुछ लिख डालूं।
समुंदरों का वैभव लिख दूँ,
या नदियों के तट लिख डालंू।
तुंग शिखर पर्वत का लिख दूँ,
या लिख डालूं गहरी खाई।
वन उपवन की लिखूं सुगंध,
या उजड़े वन की टूटी डाली।
मैं करता शब्द संरचना को,
शब्दों की माया लिख डालंू।
सूरज का ताप लिखूं या,
शीतलता चंदा वाली।
आसमान में टिम टिम करते,
तारों की संख्या लिख डालूं।
ए मेरे भारत देश बता, सब कुछ अर्पण मैं कर डालंू।
-रामकृष्ण बघेल, ग्वालियर
मो. 7879705286
लिख डालूं…
लिख डालूं…
खाली-खाली क्यों बैठंू,
क्यों न सब कुछ लिख डालूं।
समुंदरों का वैभव लिख दूँ,
या नदियों के तट लिख डालंू।
तुंग शिखर पर्वत का लिख दूँ,
या लिख डालूं गहरी खाई।
वन उपवन की लिखूं सुगंध,
या उजड़े वन की टूटी डाली।
मैं करता शब्द संरचना को,
शब्दों की माया लिख डालंू।
सूरज का ताप लिखूं या,
शीतलता चंदा वाली।
आसमान में टिम टिम करते,
तारों की संख्या लिख डालूं।
ए मेरे भारत देश बता, सब कुछ अर्पण मैं कर डालंू।
-रामकृष्ण बघेल, ग्वालियर
मो. 7879705286
