बिहार के पाल (गड़ेरी, भेड़िहार) जाति के लिए यह साल ऐतिहासिक साबित हुआ है। इस वर्ष के आखिरी माह के पहले दिन अर्थात 1 दिसम्बर को बिहार के पाल समाज में प्रसन्नता दिखी, ऐसा लग रहा था मानो वर्षों की मुराद पूरी हुई हो। इस साल की शुरूआत में ही 1993 की गूँज सुनाई देने लगी थी और 1993 के राजनीतिक इतिहास को दुहराने का स्वप्न पाल समाज देखने लगा था, जो कि साल के अंत में साकार भी हुआ।
अत्यंत पिछड़ा वर्ग में पाल जाति की स्थिति
साल 2023 में गाँधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर को बिहार की महागठबंधन सरकार द्वारा जातिगत सर्वेक्षण की रिपोर्ट को जारी किया गया, जिसमें अन्य सहित कुल 215 जातियों के आँकड़े प्रस्तुत किये गए। 215 में से लगभग 115 जातियां अत्यंत पिछड़े वर्ग के अंतर्गत आती हैं, जिनकी कुल आबादी 36.014% है। आँकड़े जारी होने के बाद अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों ने दावा किया कि 2025 के विधानसभा चुनाव में सभी पार्टियाँ अत्यंत पिछड़ा वर्ग को अधिक महत्व देंगी अर्थात अत्यंत पिछड़ा केंद्रित चुनाव होगा, क्योंकि एक तिहाई से अधिक आबादी है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आँकड़े सामने आने के बाद जिस तेजी से इस वर्ग की चर्चा शुरू हुई थी, वह दिनोंदिन कम होती गई और आचार संहिता लागू होते-होते बिल्कुल सिमट सी गई। इसके पीछे मुख्य कारण जाति प्रधान देश में वर्गीय चेतना की बजाय जातीय चेतना की प्रधानता है। राजनीति में जनसंख्या और संसाधन का महत्वपूर्ण स्थान हो गया है और अत्यंत पिछड़ा वर्ग की अधिकांश जातियों के पास दोनों का अभाव है। यदि अत्यंत पिछड़ा वर्ग की 115 जातियों का आंकड़ा देखा जाए तो 15 जातियाँ भी ऐसी नहीं हैं, जिनकी आबादी एक प्रतिशत या उससे अधिक हो। अत्यंत पिछड़ा वर्ग में तेली (2.81%), मल्लाह (2.60%), कानू (2.21%), धानुक (2.13%), नोनिया (1.91%) एवं चन्द्रवंशी (1.64%) जाति की आबादी अधिक है, जिसके कारण राजनीति में इनकी भागीदारी दिख जाती है। लेकिन 100 से अधिक जातियों की भागीदारी सदन में शून्य रहती है। अत्यंत पिछड़ा वर्ग में सर्वाधिक आबादी मोमिन-जुलाहा (3.54%) जाति की है लेकिन मुस्लिम होने के कारण राजनीतिक रूप से वे अल्पसंख्यक में गिन लिए जाते हैं और अल्पसंख्यक कोटे की सीटें अशराफ के खाते में चली जाती हैं। बिहार सरकार द्वारा प्रकाशित बिहार गजट में अत्यंत पिछड़ा वर्ग की सूची में विलोपित सहित कुल 127 जातियाँ हैं, जिसमें 47वें स्थान पर पाल (भेड़िहार, गड़ेरी) जाति अंकित है, जिसकी कुल आबादी जातिगत सर्वेक्षण के अनुसार मात्र 0.27 प्रतिशत (3,63,529) है। यह आँकड़े आने से पहले पाल जाति के नेता अलग-अलग दावा करते थे, जिसमें कोई एक, कोई तीन तो कोई पांच प्रतिशत तक का दावा करता था, लेकिन आँकड़े सामने आने के बाद बहुत सारे पाल नेता आवाक रहे गए, कई लोग तो आँकड़ों पर ही सवाल खड़ा करने लगे। खैर, सच्चाई जो भी हो लेकिन जो आँकड़े अभी सामने हैं, उसके अनुसार अत्यंत पिछड़ा वर्ग में आबादी के आधार पर पाल जाति 25वें स्थान पर है। बिहार विधानसभा के सत्रह कार्यकाल बीत गए लेकिन एक भी पाल जाति का व्यक्ति विधायक नहीं बन पाया। यदि अन्य क्षेत्रों में देखा जाए तो पाल जाति की स्थिति अत्यंत पिछड़ा वर्ग में बेहतर है। यदि बिहार में कुल जातियों का औसत देखा जाए तो 12वीं तक की शिक्षा प्राप्त करने वाले मात्र 9.19 प्रतिशत हैं। यदि अत्यंत पिछड़ा वर्ग का औसत देखा जाए तो मात्र 7.95 प्रतिशत है लेकिन पाल जाति में 12वीं तक शिक्षा प्राप्त करने वालों की औसत आबादी 12.34 प्रतिशत है। सरकारी नौकरी के मामले में बिहार की औसत आबादी मात्र 1.57 प्रतिशत तथा अत्यंत पिछड़ा वर्ग की औसत आबादी मात्र 0.98% प्रतिशत है जबकि पाल जाति की औसत आबादी 2.28 प्रतिशत है। गरीबी के मामले में 6000 रुपये प्रतिमाह से कम कमाने वाले बिहार में कुल 34.13 प्रतिशत परिवार तथा अत्यंत पिछड़ा वर्ग में 33.58 प्रतिशत परिवार हैं जबकि पाल जाति में 33.20 प्रतिशत परिवार हैं। मोटर गाड़ी रखने, कम्प्यूटर/लैपटॉप रखने एवं मकान बनाने के मामले में भी पाल जाति का औसत ठीक है।
प्रथम पाल महासम्मेलन और बिहार विधानपरिषद में दस्तक
पटना के विशाल गाँधी मैदान में 10 मार्च, 1990 को पहली बार लालू प्रसाद ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, जिसका गवाह आम जनता भी बनी। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की राजनीति हिलोर मारने लगी। तमाम पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियाँ अपना-अपना सम्मेलन करने लगीं और मुख्यमंत्री उनमें बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे। इसी कड़ी में बिहार राज्य युवा पाल महासंघ के बैनर तले 28 फरवरी 1993 को पटना के मिलर हाईस्कूल के प्रांगण में पाल महासम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संयोजन वंशीधर पाल ने किया, जिसे रामचरित्र पाल के नेतृत्व में युवाओं की टीम ने सफल बनाया। डॉ. रामकरण पाल की अध्यक्षता में आयोजित महासम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद पधारे थे। महासम्मेलन के कुछ माह बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने अत्यंत पिछड़ा वर्ग के कई नेताओं को विधानपरिषद सदस्य बनाया, जिसमें पाल जाति के डॉ. रामकरण पाल भी बने। इस उपलब्धि के बाद बिहार (झारखण्ड सहित) के पाल प्रफुल्लित हो उठे थे। डॉ. रामकरण पाल विधान परिषद में सचेतक भी बने थे।
दूसरा पाल महासम्मेलन और बिहार विधानसभा में दस्तक
सन 1993 में विधान परिषद में पाल जाति का पदार्पण कराने में पाल महासम्मेलन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है लेकिन विधानसभा में पाल जाति के सदस्य को प्रवेश दिलाने में पाल महासम्मेलन की भूमिका नहीं के बराबर है। महज एक संयोग मात्र है कि 2025 में दूसरा पाल महासम्मेलन हुआ और पहली बार पाल जाति से कोई व्यक्ति विधायक बन गया। दरअसल 1993 के बाद से ही पाल समाज की निगाहें विधानसभा में अपनों को ढूंढने लगी थीं लेकिन ढूँढते हुए बत्तीस साल बीत गए। अठारहवीं विधानसभा में पहली बार पाल जाति के प्रो. नागेंद्र राउत ने विधायक बनकर विधानसभा में दस्तक दी। 2 अक्टूबर 2023 को जातिगत सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी होने के मात्र एक माह बाद ही 5 नवम्बर 2023 को बिहार राज्य पाल महासंघ के बैनर तले कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया गया और एक पाल महासम्मेलन कराने का संकल्प लिया गया, जिसे 14 जून 2025 को पटना के कृष्ण मेमोरियल हॉल में बिहार राज्य पाल महासंघ के बैनर तले चंद्रमोहन पाल की अध्यक्षता में पाल महासम्मेलन आयोजित करके पूरा किया गया। संयोग की बात है कि प्रथम पाल महासम्मेलन में मुख्य अतिथि सह उद्घाटनकर्ता तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे तथा दूसरे पाल महासम्मेलन में मुख्य अतिथि सह उद्घाटनकर्ता तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल मौजूद थे। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि ने कहा था कि पाल समाज का कर्ज सूद समेत चुकता कर दूँगा। यह बात सुनकर पाल समाज में एक उम्मीद जग गई थी कि एक टिकट जरूर मिलेगा लेकिन मिल न सका। देहरी विधानसभा के टिकट हेतु अंतिम समय तक महासंघ के उपाध्यक्ष अमरेंद्र पाल स्पर्धा में बने रहे, लेकिन निराशा हाथ लगी। विदित हो कि बिहार में आज तक राजद, कांग्रेस एवं भाजपा से पाल जाति को टिकट नहीं मिले हैं। जदयू ने पहली बार 2025 में समस्तीपुर के 26-सुरसंड विधानसभा क्षेत्र से प्रो. नागेंद्र राउत को प्रत्याशी बनाया और वे विजयी हुए। इससे पहले बसपा ने कई बार टिकट दी लेकिन उम्मीदवार जीत नहीं पाए। इस बार भी बसपा से तीन टिकट पाल जाति के उम्मीदवारों को मिले थे लेकिन न जाने कैसे तीनों व्यक्तियों के नामांकन रद्द हो गए। मालूम हो कि इस साल 23 मार्च को पटना के मिलर हाईस्कूल में बिहार गड़ेरिया मोर्चा (युवा) के बैनर तले हुँकार रैली का भी आयोजन किया गया था। हर साल की भाँति इस साल भी पाल पारिवारिक मिलन सह सम्मान समारोह का आयोजन भी 13 अप्रैल को किया गया था। लगभग प्रत्येक वर्ष पाल जाति द्वारा पटना में एक-दो सम्मेलन आयोजित किये जाते रहे हैं लेकिन इस साल तीन महत्वपूर्ण आयोजन हुए और सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि पहली बार बिहार में भी पाल जाति का कोई विधायक बना। बिहार में पाल जाति की जनसंख्या भले ही कम है लेकिन टाइटल खूब है। शाहाबाद में पाल, मगध में भगत, सारण-वैशाली में राय-यादव, तिरहुत में राउत, कोसी में मंडल, मुंगेर में चौधरी आदि कई टाइटल पाल जाति के लोग लगाते हैं। बिहार के पाल समाज के लिए 1993 तथा 2025 दोनों ऐतिहासिक साल हो गए हैं। अब तीसरा ऐतिहासिक साल तब होगा जब बिहार में पाल जाति का कोई सांसद बनेगा। -डॉ. दिनेश पाल
