Wednesday, March 4, 2026

National

spot_img

इंदौर : परिचय सम्मेलनों की बाढ़ और समाज की असली दशा-एक कड़वा सच

​इंदौर, जो माँ अहिल्या की संस्कारधानी है, आज वहाँ समाज की एक अजीब तस्वीर उभर रही है। शहर में युवक-युवती परिचय सम्मेलनों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। अल्प समय के भीतर हुए कई बड़े आयोजन हमारी बढ़ती शक्ति का प्रदर्शन हैं या आपसी प्रतिस्पर्धा और बिखराव का संकेत? इस पर गहरा चिंतन आवश्यक है।

​आयोजनों की सफलता और भव्यता
समाज में पिछले कुछ महीनों से आयोजनों की एक श्रृंखला देखने को मिली है। 26 अक्टूबर 2025 और 9 नवंबर 2025 को हुए आयोजन अपनी व्यवस्थाओं के कारण सफलतापूर्वक संपन्न हुए। उसी कड़ी में 4 जनवरी 2026 का कार्यक्रम जन-भागीदारी और भीड़ के मामले में अब तक के सभी आयोजनों में अव्वल रहा। इतनी बड़ी संख्या में समाज बंधुओं की उपस्थिति और शैतान सिंह पाल की उपस्थिति ने कार्यक्रम को एक नई ताकत और ऊंचाई प्रदान की। इन सभी आयोजनों की सफलता के पीछे आयोजकों की कड़ी मेहनत और समाज का सहयोग प्रशंसनीय है। ​परंतु, एक सामाजिक चिंतक के नाते कुछ कड़वे लेकिन जरूरी सवाल उठाने भी आवश्यक हैं-

​1. क्या लकी ड्रॉ की यह नयी परंपरा उचित है?
आजकल परिचय सम्मेलनों में ‘लकी ड्रॉ’ के माध्यम से उपहार बांटने की एक नयी परंपरा शुरू हुई है। प्रश्न यह है कि क्या यह एक पवित्र वैवाहिक मंच है या कोई मेला? रिश्तों के चयन जैसे गंभीर विषय वाले कार्यक्रम में उपहारों का आकर्षण देना कहीं न कहीं आयोजन की गरिमा को कम करता है। समाज को इन आडंबरों से ऊपर उठकर रिश्तों की गहराई और पारिवारिक मिलन पर ध्यान देना चाहिए। क्या हम उपहारों के माध्यम से भीड़ जुटाकर रिश्तों की पवित्रता से समझौता नहीं कर रहे हैं?

​2. राजनीति और सामाजिक मंच की मर्यादा
राजनीति में समाज की भागीदारी अनिवार्य है, लेकिन सामाजिक मंचों पर जब राजनीति हावी होती है, तो समाज के जो मूल उद्देश्य हैं, वे पीछे छूट जाते हैं। समाज में हर विचारधारा के लोग होते हैं; जब हम मंचों को राजनीति का केंद्र बनाते हैं, तो वैचारिक मतभेदों के कारण समाज अनजाने में बिखरने लगता है। हमारा मूल मंत्र ‘समाज प्रथम’ होना चाहिए। यदि समाज का कोई भी योग्य व्यक्ति किसी भी दल से दावेदारी करता है, तो पूरे समाज को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संगठित रूप से उसका समर्थन करना चाहिए।

​3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जमीनी संघर्ष
अक्सर यह धारणा बन जाती है कि सामाजिक सम्मेलनों की भीड़ ही राजनीतिक सफलता का पैमाना है। परंतु वास्तविक प्रतिनिधित्व केवल सम्मेलनों के मंच से नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र और ‘वार्ड’ में निरंतर सक्रियता व जनसेवा से प्राप्त होता है। सामाजिक बंधुओं को अपनी असली ताकत सम्मेलनों की चकाचौंध के बजाय धरातल पर जनता के सुख-दुख के बीच दिखानी चाहिए। राजनीतिक दल भी समाज की भीड़ से ज्यादा व्यक्ति की ‘जन-स्वीकार्यता’ को महत्व देते हैं।

​4. संगठन ही शक्ति है
अल्प समय में बार-बार होने वाले पृथक आयोजन हमारी शक्ति को विभाजित करते हैं, जो हमारी ‘असंगठित सोच’ का प्रतीक हैं। जब तक हम व्यक्तिगत मनमुटाव दूर नहीं करेंगे और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी रहेगी, तब तक समाज केवल ‘वोट बैंक’ की तरह उपयोग होता रहेगा। हमें अपनी ऊर्जा केवल सम्मेलनों में नहीं, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी ढांचों को मजबूत करने में भी लगानी चाहिए।

​निष्कर्ष :
मेरा उद्देश्य किसी की मेहनत को कम आंकना नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाना है। यदि हम आज संगठित नहीं हुए और अपनी दिशा तय नहीं की, तो आने वाली पीढ़ी हमें इस वैचारिक बिखराव के लिए कभी माफ नहीं करेगी।
-राजेश कुमार पाल, इंदौर
(बीमा वाला एवं सामाजिक चिंतक)
मो. 9424831940

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

International

spot_img

इंदौर : परिचय सम्मेलनों की बाढ़ और समाज की असली दशा-एक कड़वा सच

​इंदौर, जो माँ अहिल्या की संस्कारधानी है, आज वहाँ समाज की एक अजीब तस्वीर उभर रही है। शहर में युवक-युवती परिचय सम्मेलनों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। अल्प समय के भीतर हुए कई बड़े आयोजन हमारी बढ़ती शक्ति का प्रदर्शन हैं या आपसी प्रतिस्पर्धा और बिखराव का संकेत? इस पर गहरा चिंतन आवश्यक है।

​आयोजनों की सफलता और भव्यता
समाज में पिछले कुछ महीनों से आयोजनों की एक श्रृंखला देखने को मिली है। 26 अक्टूबर 2025 और 9 नवंबर 2025 को हुए आयोजन अपनी व्यवस्थाओं के कारण सफलतापूर्वक संपन्न हुए। उसी कड़ी में 4 जनवरी 2026 का कार्यक्रम जन-भागीदारी और भीड़ के मामले में अब तक के सभी आयोजनों में अव्वल रहा। इतनी बड़ी संख्या में समाज बंधुओं की उपस्थिति और शैतान सिंह पाल की उपस्थिति ने कार्यक्रम को एक नई ताकत और ऊंचाई प्रदान की। इन सभी आयोजनों की सफलता के पीछे आयोजकों की कड़ी मेहनत और समाज का सहयोग प्रशंसनीय है। ​परंतु, एक सामाजिक चिंतक के नाते कुछ कड़वे लेकिन जरूरी सवाल उठाने भी आवश्यक हैं-

​1. क्या लकी ड्रॉ की यह नयी परंपरा उचित है?
आजकल परिचय सम्मेलनों में ‘लकी ड्रॉ’ के माध्यम से उपहार बांटने की एक नयी परंपरा शुरू हुई है। प्रश्न यह है कि क्या यह एक पवित्र वैवाहिक मंच है या कोई मेला? रिश्तों के चयन जैसे गंभीर विषय वाले कार्यक्रम में उपहारों का आकर्षण देना कहीं न कहीं आयोजन की गरिमा को कम करता है। समाज को इन आडंबरों से ऊपर उठकर रिश्तों की गहराई और पारिवारिक मिलन पर ध्यान देना चाहिए। क्या हम उपहारों के माध्यम से भीड़ जुटाकर रिश्तों की पवित्रता से समझौता नहीं कर रहे हैं?

​2. राजनीति और सामाजिक मंच की मर्यादा
राजनीति में समाज की भागीदारी अनिवार्य है, लेकिन सामाजिक मंचों पर जब राजनीति हावी होती है, तो समाज के जो मूल उद्देश्य हैं, वे पीछे छूट जाते हैं। समाज में हर विचारधारा के लोग होते हैं; जब हम मंचों को राजनीति का केंद्र बनाते हैं, तो वैचारिक मतभेदों के कारण समाज अनजाने में बिखरने लगता है। हमारा मूल मंत्र ‘समाज प्रथम’ होना चाहिए। यदि समाज का कोई भी योग्य व्यक्ति किसी भी दल से दावेदारी करता है, तो पूरे समाज को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संगठित रूप से उसका समर्थन करना चाहिए।

​3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जमीनी संघर्ष
अक्सर यह धारणा बन जाती है कि सामाजिक सम्मेलनों की भीड़ ही राजनीतिक सफलता का पैमाना है। परंतु वास्तविक प्रतिनिधित्व केवल सम्मेलनों के मंच से नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र और ‘वार्ड’ में निरंतर सक्रियता व जनसेवा से प्राप्त होता है। सामाजिक बंधुओं को अपनी असली ताकत सम्मेलनों की चकाचौंध के बजाय धरातल पर जनता के सुख-दुख के बीच दिखानी चाहिए। राजनीतिक दल भी समाज की भीड़ से ज्यादा व्यक्ति की ‘जन-स्वीकार्यता’ को महत्व देते हैं।

​4. संगठन ही शक्ति है
अल्प समय में बार-बार होने वाले पृथक आयोजन हमारी शक्ति को विभाजित करते हैं, जो हमारी ‘असंगठित सोच’ का प्रतीक हैं। जब तक हम व्यक्तिगत मनमुटाव दूर नहीं करेंगे और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी रहेगी, तब तक समाज केवल ‘वोट बैंक’ की तरह उपयोग होता रहेगा। हमें अपनी ऊर्जा केवल सम्मेलनों में नहीं, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी ढांचों को मजबूत करने में भी लगानी चाहिए।

​निष्कर्ष :
मेरा उद्देश्य किसी की मेहनत को कम आंकना नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाना है। यदि हम आज संगठित नहीं हुए और अपनी दिशा तय नहीं की, तो आने वाली पीढ़ी हमें इस वैचारिक बिखराव के लिए कभी माफ नहीं करेगी।
-राजेश कुमार पाल, इंदौर
(बीमा वाला एवं सामाजिक चिंतक)
मो. 9424831940

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

National

spot_img

International

spot_img
RELATED ARTICLES