इस मल्टीमीडिया के युग में, विचारों के विज्ञापन के इस दौर में, समाज के लोगों को अपने अनुभव साझा करने में ही भलाई और उचित जान पड़ता है। मैं अपनी 62 वर्ष की जीवन यात्रा में हूँ और दुनियादारी से मुकाबला करते हुए मुझे 42 वर्ष बीत चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई, नौकरी-चाकरी, यश-अपयश और मान-अपमान की जंग के जो अनुभव रहे हैं, वह मैं आप लोगों को बताना चाहता हूँ। इसका कारण यह नहीं है कि आप लोग जानते या समझते नहीं हैं, या आप लोगों ने मेरे से कम या ज्यादा संघर्ष नहीं किए हैं। सभी ने संघर्ष किए हैं और सभी स्टेटस, हैसियत, प्रतिभा, धन और वैभव रखते हैं। जो लोग अभी इस स्थिति में नहीं हैं, लोकतंत्र में वे भी इतना तो जान गए हैं कि उनका हित-अनहित कहाँ है। वे भी छोटे-बड़े प्रयासों से अपने परिवार और यथासंभव समाज विकास में योगदान देते आए हैं। हमें अफसोस है कि अपने अनुभव के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हमारा समाज अन्य समाजों की तुलना में अपने ही लोगों से ज्यादा ईर्ष्या रखता है। कम शिक्षा या व्यावहारिक ज्ञान की कमी के कारण कुछ लोग अपने महत्व प्रदर्शन में एक ‘हीनता की भावना’ का शिकार हैं। वे अपने लोगों को साथ लेकर चलने के बजाय केवल स्वयं के प्रदर्शन में लगे रहते हैं। समाजसेवा के नाम पर झूठे मंचों और गुटबाजी का बोलबाला है। राजनीतिक पहचान के लिए चाटुकारिता का सहारा लिया जाता रहा है। अभी तक समाज में अपनी कमियों को स्वीकार करने की हिम्मत या नम्रता नहीं आई है। आज इस निर्णायक समय पर मैं आप सबको इतना ही संदेश देना चाहता हूँ कि एक-दूसरे को समझें और उनके छोटे-बड़े प्रयासों को सराहें। ‘हम नहीं आएँगे तो देखें आप कैसे करेंगे’ या ‘हमने इतना किया है’ वाला अहं भाव समाज सेवा के मार्ग में बाधा है। झूठे मानकों और झूठे सिद्धांतों से समाज सेवा का कोई वास्ता नहीं है। सभी समाज सेवकों से मेरा आग्रह है कि आप सब सामयिक विषयों विशेषकर शिक्षा पर काम करें, जनपदों में गोष्ठियां आयोजित करें, पुस्तकालय और छात्रावास बनवाएं। यह कार्य न केवल पाल, बघेल, गडरिया समाज के लिए, बल्कि अन्य पिछड़ों, शोषितों और दलितों की सेवा में भी सहायक होगा।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
मो. 9794866822
एक-दूसरे को समझें और उनके छोटे-बड़े प्रयासों को सराहें!
एक-दूसरे को समझें और उनके छोटे-बड़े प्रयासों को सराहें!
इस मल्टीमीडिया के युग में, विचारों के विज्ञापन के इस दौर में, समाज के लोगों को अपने अनुभव साझा करने में ही भलाई और उचित जान पड़ता है। मैं अपनी 62 वर्ष की जीवन यात्रा में हूँ और दुनियादारी से मुकाबला करते हुए मुझे 42 वर्ष बीत चुके हैं। पढ़ाई-लिखाई, नौकरी-चाकरी, यश-अपयश और मान-अपमान की जंग के जो अनुभव रहे हैं, वह मैं आप लोगों को बताना चाहता हूँ। इसका कारण यह नहीं है कि आप लोग जानते या समझते नहीं हैं, या आप लोगों ने मेरे से कम या ज्यादा संघर्ष नहीं किए हैं। सभी ने संघर्ष किए हैं और सभी स्टेटस, हैसियत, प्रतिभा, धन और वैभव रखते हैं। जो लोग अभी इस स्थिति में नहीं हैं, लोकतंत्र में वे भी इतना तो जान गए हैं कि उनका हित-अनहित कहाँ है। वे भी छोटे-बड़े प्रयासों से अपने परिवार और यथासंभव समाज विकास में योगदान देते आए हैं। हमें अफसोस है कि अपने अनुभव के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हमारा समाज अन्य समाजों की तुलना में अपने ही लोगों से ज्यादा ईर्ष्या रखता है। कम शिक्षा या व्यावहारिक ज्ञान की कमी के कारण कुछ लोग अपने महत्व प्रदर्शन में एक ‘हीनता की भावना’ का शिकार हैं। वे अपने लोगों को साथ लेकर चलने के बजाय केवल स्वयं के प्रदर्शन में लगे रहते हैं। समाजसेवा के नाम पर झूठे मंचों और गुटबाजी का बोलबाला है। राजनीतिक पहचान के लिए चाटुकारिता का सहारा लिया जाता रहा है। अभी तक समाज में अपनी कमियों को स्वीकार करने की हिम्मत या नम्रता नहीं आई है। आज इस निर्णायक समय पर मैं आप सबको इतना ही संदेश देना चाहता हूँ कि एक-दूसरे को समझें और उनके छोटे-बड़े प्रयासों को सराहें। ‘हम नहीं आएँगे तो देखें आप कैसे करेंगे’ या ‘हमने इतना किया है’ वाला अहं भाव समाज सेवा के मार्ग में बाधा है। झूठे मानकों और झूठे सिद्धांतों से समाज सेवा का कोई वास्ता नहीं है। सभी समाज सेवकों से मेरा आग्रह है कि आप सब सामयिक विषयों विशेषकर शिक्षा पर काम करें, जनपदों में गोष्ठियां आयोजित करें, पुस्तकालय और छात्रावास बनवाएं। यह कार्य न केवल पाल, बघेल, गडरिया समाज के लिए, बल्कि अन्य पिछड़ों, शोषितों और दलितों की सेवा में भी सहायक होगा।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
मो. 9794866822
