गड़रिया समाज का वोट लेने वाली सभी पार्टियां जो राजनीति के क्षेत्र में ऊंचाई पर हैं उनसे मेरा नम्र निवेदन है कि जो गड़रिया समाज के साथ अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है उस पर ध्यान केंद्रित करें और दोषी लोगों को कड़ी से कड़ी सजा दें और दिलाएं अन्यथा इसका दुष्परिणाम झेलने के लिए तैयार रहें। गड़रिया समाज जितना भोला है उससे कई गुना ज्यादा उग्र होना भी जानता है। जिस दिन इसकी सहनशीलता पार हो गई, याद रखना उस दिन सरकार के सभी तंत्र काम करना बंद कर देंगे। इस समाज पर इतना ज्यादा अत्याचार मत करो कि रामबाबू गड़रिया जैसे हजारों युवा बागी हो जाएं। कानपुर की घटना जो वीरपाल सिंह पाल के साथ घटित हुई है उससे समाज का मन बहुत खिन्न है। शैलेन्द्र यादव ने जो अत्याचार किया है उसको इसकी कड़ी से कड़ी सजा दी और दिलाई जाए। इस घटना को जानकर-समझकर जो निष्कर्ष मेरे दिमाग में आया है उसे आप सभी के बीच रखता हूं। कानपुर की घटना गड़रिया समाज को कमजोर करने की एक सोची-समझी चाल है, गड़रिया समाज की उभरती हुई साख को कमजोर करने का प्रयत्न है। गड़रिया समाज के मनोबल को तोड़ने का प्रयास है। उत्तर प्रदेश में आने वाले ग्राम पंचायतों के चुनाव से लेकर जिला पंचायत व विधानसभा के चुनावों को मद्देनजर रखते हुए दबंगों ने इस घटना को अंजाम दिया है। गड़रिया समाज को इस घटना से सीख लेनी चाहिए कि हम जिस किसी भी पार्टी का झंडा उठाते हैं उसके गुर्गे ही हमारे साथ अन्याय करते हैं, जिसमें उस पार्टी के सभ्य समाज के लोग, पार्टी के बड़े नेता या तो गड़रिया समाज पर हुए अत्याचार की घटनाओं को अनदेखा करते हैं या साथ खड़े होने का दिखावा करते हैं। असल में सच्चाई तो ये है कि ये सभी गड़रिया समाज को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते हैं, चाहे वह किसी भी समाज के लोग हों। क्योंकि सब जानते हैं कि अतीत में गड़रिया समाज बहुत मजबूत था, गड़रिया समाज के राजा-रजवाड़े थे। मध्य में गड़रिया समाज धीरे-धीरे बहुत कमजोर हो गया था जिसके कई कारण थे। इस गड़रिया समाज ने कभी अपना स्थायी ठिकाना नहीं बनाया। अपने आपको और अपने धर्म को बचाने के लिए मुगल काल में इधर-उधर भटकते रहे और मौका मिलने पर मुगलों को धूल भी चटाते रहे, पर समझौता नहीं किया। आज गड़रिया समाज धीरे-धीरे जागरूक हो रहा है, मजबूत हो रहा है, अपने आपको पहचान रहा है, अपनी ताकत को जान रहा है, राजनीति को समझ रहा है, अपने हक के लिए लड़ रहा है। इसलिए इसका आगे बढ़ना सर्वसमाज को खल रहा है। यही कारण है कि आज समाज के लोगों की किसी न किसी षड्यंत्र के तहत हिम्मत को तोड़ा जा रहा है, कमजोर किया जा रहा है। समाज के नेता अपनी-अपनी पार्टियों में कठपुतली बने हुए हैं। वे समाज का वोट लेने के लिए समाज के साथ खड़े हो जाते हैं और जब समाज पर अत्याचार होता है तो मौन हो जाते हैं या फिर गोल-मोल बात करके समाज की लड़ाई को कमजोर कर देते हैं। समाज की लड़ाई को लड़ने वाले अग्रिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को समाज के नेता पार्टी में छोटा-मोटा पद देकर या जिला पंचायत, विधानसभा का पार्टी से टिकट दिलाने का वादा कर लॉलीपोप पकड़ा देते हैं। समाज को आगे बढ़ाने वाला अग्रिम पंक्ति का व्यक्ति ही समाज का हनन करने लगता है। समाज को ऐसे नेता की जरूरत है जो सत्ता के लिए नहीं, समाज के लिए लड़े। सत्ता के लिए लड़ने वाला समाज का भला नहीं कर सकता है। अपनी कुछ पंक्तियों से गड़रिया समाज व सर्वसमाज को आईना दिखाता हूं-
हमसे ज्यादा दोषी बोलो, कौन यहां हो सकता है।
चोटों पर चोटें खा कोई, मौन यहां हो सकता है।
शेरों के जबड़े फाड़े तब, हमें गड़रिया कहते हैं।
हिंसक सारे जीव-जंतु, डर के साये में रहते हैं।
शेरों से हम लड़ने वाले, श्वानों से घबराए हैं।
इसीलिए दुख के बादल, सिर अपने पर मंडराए हैं।
मानवता में भावुक होकर, हमने नीर बहाए हैं।
भावुकता में अपने तन के, हिस्से कई कराए हैं।
भावुकता को छोड़ अगर, कर में तलवार उठा लेते।
हम क्षत्रिय थे क्षत्रिय वाला, खुलकर भार उठा लेते।
तो दहशतगर्दी श्वानों की, हम नहीं झेलते होते।
दुश्मन की धरती पर हम भी, फिर खेल खेलते होते।
अंतिम दो शब्द समाज के लिए-
हक अपना लेने की खातिर, कदम बढ़ाना पड़ता है।
अर्जुन बनकर प्रत्यंचा पर, तीर चढ़ाना पड़ता है।
अनुनय विनय बहुत की हरि ने, पर सागर कब माना था।
अग्निपुंज शर चाप धरा तब, उसने बल को जाना था।
-कवि डॉ. अशोक पाल ‘आशु’, दिल्ली
मो. 9643066785
गडरिया समाज पर अत्याचार रोकें समाज के नेता!
गडरिया समाज पर अत्याचार रोकें समाज के नेता!
गड़रिया समाज का वोट लेने वाली सभी पार्टियां जो राजनीति के क्षेत्र में ऊंचाई पर हैं उनसे मेरा नम्र निवेदन है कि जो गड़रिया समाज के साथ अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है उस पर ध्यान केंद्रित करें और दोषी लोगों को कड़ी से कड़ी सजा दें और दिलाएं अन्यथा इसका दुष्परिणाम झेलने के लिए तैयार रहें। गड़रिया समाज जितना भोला है उससे कई गुना ज्यादा उग्र होना भी जानता है। जिस दिन इसकी सहनशीलता पार हो गई, याद रखना उस दिन सरकार के सभी तंत्र काम करना बंद कर देंगे। इस समाज पर इतना ज्यादा अत्याचार मत करो कि रामबाबू गड़रिया जैसे हजारों युवा बागी हो जाएं। कानपुर की घटना जो वीरपाल सिंह पाल के साथ घटित हुई है उससे समाज का मन बहुत खिन्न है। शैलेन्द्र यादव ने जो अत्याचार किया है उसको इसकी कड़ी से कड़ी सजा दी और दिलाई जाए। इस घटना को जानकर-समझकर जो निष्कर्ष मेरे दिमाग में आया है उसे आप सभी के बीच रखता हूं। कानपुर की घटना गड़रिया समाज को कमजोर करने की एक सोची-समझी चाल है, गड़रिया समाज की उभरती हुई साख को कमजोर करने का प्रयत्न है। गड़रिया समाज के मनोबल को तोड़ने का प्रयास है। उत्तर प्रदेश में आने वाले ग्राम पंचायतों के चुनाव से लेकर जिला पंचायत व विधानसभा के चुनावों को मद्देनजर रखते हुए दबंगों ने इस घटना को अंजाम दिया है। गड़रिया समाज को इस घटना से सीख लेनी चाहिए कि हम जिस किसी भी पार्टी का झंडा उठाते हैं उसके गुर्गे ही हमारे साथ अन्याय करते हैं, जिसमें उस पार्टी के सभ्य समाज के लोग, पार्टी के बड़े नेता या तो गड़रिया समाज पर हुए अत्याचार की घटनाओं को अनदेखा करते हैं या साथ खड़े होने का दिखावा करते हैं। असल में सच्चाई तो ये है कि ये सभी गड़रिया समाज को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहते हैं, चाहे वह किसी भी समाज के लोग हों। क्योंकि सब जानते हैं कि अतीत में गड़रिया समाज बहुत मजबूत था, गड़रिया समाज के राजा-रजवाड़े थे। मध्य में गड़रिया समाज धीरे-धीरे बहुत कमजोर हो गया था जिसके कई कारण थे। इस गड़रिया समाज ने कभी अपना स्थायी ठिकाना नहीं बनाया। अपने आपको और अपने धर्म को बचाने के लिए मुगल काल में इधर-उधर भटकते रहे और मौका मिलने पर मुगलों को धूल भी चटाते रहे, पर समझौता नहीं किया। आज गड़रिया समाज धीरे-धीरे जागरूक हो रहा है, मजबूत हो रहा है, अपने आपको पहचान रहा है, अपनी ताकत को जान रहा है, राजनीति को समझ रहा है, अपने हक के लिए लड़ रहा है। इसलिए इसका आगे बढ़ना सर्वसमाज को खल रहा है। यही कारण है कि आज समाज के लोगों की किसी न किसी षड्यंत्र के तहत हिम्मत को तोड़ा जा रहा है, कमजोर किया जा रहा है। समाज के नेता अपनी-अपनी पार्टियों में कठपुतली बने हुए हैं। वे समाज का वोट लेने के लिए समाज के साथ खड़े हो जाते हैं और जब समाज पर अत्याचार होता है तो मौन हो जाते हैं या फिर गोल-मोल बात करके समाज की लड़ाई को कमजोर कर देते हैं। समाज की लड़ाई को लड़ने वाले अग्रिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को समाज के नेता पार्टी में छोटा-मोटा पद देकर या जिला पंचायत, विधानसभा का पार्टी से टिकट दिलाने का वादा कर लॉलीपोप पकड़ा देते हैं। समाज को आगे बढ़ाने वाला अग्रिम पंक्ति का व्यक्ति ही समाज का हनन करने लगता है। समाज को ऐसे नेता की जरूरत है जो सत्ता के लिए नहीं, समाज के लिए लड़े। सत्ता के लिए लड़ने वाला समाज का भला नहीं कर सकता है। अपनी कुछ पंक्तियों से गड़रिया समाज व सर्वसमाज को आईना दिखाता हूं-
हमसे ज्यादा दोषी बोलो, कौन यहां हो सकता है।
चोटों पर चोटें खा कोई, मौन यहां हो सकता है।
शेरों के जबड़े फाड़े तब, हमें गड़रिया कहते हैं।
हिंसक सारे जीव-जंतु, डर के साये में रहते हैं।
शेरों से हम लड़ने वाले, श्वानों से घबराए हैं।
इसीलिए दुख के बादल, सिर अपने पर मंडराए हैं।
मानवता में भावुक होकर, हमने नीर बहाए हैं।
भावुकता में अपने तन के, हिस्से कई कराए हैं।
भावुकता को छोड़ अगर, कर में तलवार उठा लेते।
हम क्षत्रिय थे क्षत्रिय वाला, खुलकर भार उठा लेते।
तो दहशतगर्दी श्वानों की, हम नहीं झेलते होते।
दुश्मन की धरती पर हम भी, फिर खेल खेलते होते।
अंतिम दो शब्द समाज के लिए-
हक अपना लेने की खातिर, कदम बढ़ाना पड़ता है।
अर्जुन बनकर प्रत्यंचा पर, तीर चढ़ाना पड़ता है।
अनुनय विनय बहुत की हरि ने, पर सागर कब माना था।
अग्निपुंज शर चाप धरा तब, उसने बल को जाना था।
-कवि डॉ. अशोक पाल ‘आशु’, दिल्ली
मो. 9643066785
