Wednesday, March 4, 2026

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जातीय पत्रकारिता करना आसान नहीं है!

हरिकमल दर्पण हिंदी साप्ताहिक समाज के कार्यक्रमों का आइना है। सम्पादक महोदय को मेरी सलाह है कि सोशल मीडिया के दौर में कवरेज देते समय थोड़ा सख्ती बरतें, क्योंकि जन सरोकारी पत्रकारिता और लाभकारी पत्रकारिता दोनों में बहुत अंतर है। आज सब का बाजार लग रहा है और हम भी उपभोक्तावादी संस्कृति के हिस्सा ही हैं। विज्ञापन पहले सामान बेचने का किया जाता था, आजकल विचारधारा बेची जा रही हैं। यह मानवता के सामने बड़ा संकट ही नहीं, लाइलाज सा रोग बन गया है। अब झूठे लोग अपने को समाज सेवक बनने और स्थापित करने के नाना प्रकार के रोज शिल्प गढ़ रहे हैं। ऐसे में पेपर या प्रिंट पत्रकारिता और उससे भी आगे बढ़कर जातीय पत्रकारिता करना आसान नहीं है। नीर-क्षीर-विवेक को भी झूठे रंगे सियारों ने फेल कर रखा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष सामाजिक, राजनैतिक लाभ लिप्सा से चाटुकारिता करते नहीं थक रहे हैं या वह सब अपने को स्थापित करने में लगे हैं। मुझे भी शौक लग रहा है कि कितने गधे पंजीरी खाने गणतंत्र दिवस परेड पर जायेंगे और मैं बेचारा इतनी पढ़ाई करके अपने कमरे में बैठा हिसाब लगा रहा हूँ कि इन पिछड़ों का क्या होगा जो लोकतंत्र के पचहत्तर साल बीतने पर जिन पर भी विश्वास किये वह अपने, अपनों के ही हितलाभी निकले, यह बड़ा सवाल है। -जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
मो.9794866822

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जातीय पत्रकारिता करना आसान नहीं है!

हरिकमल दर्पण हिंदी साप्ताहिक समाज के कार्यक्रमों का आइना है। सम्पादक महोदय को मेरी सलाह है कि सोशल मीडिया के दौर में कवरेज देते समय थोड़ा सख्ती बरतें, क्योंकि जन सरोकारी पत्रकारिता और लाभकारी पत्रकारिता दोनों में बहुत अंतर है। आज सब का बाजार लग रहा है और हम भी उपभोक्तावादी संस्कृति के हिस्सा ही हैं। विज्ञापन पहले सामान बेचने का किया जाता था, आजकल विचारधारा बेची जा रही हैं। यह मानवता के सामने बड़ा संकट ही नहीं, लाइलाज सा रोग बन गया है। अब झूठे लोग अपने को समाज सेवक बनने और स्थापित करने के नाना प्रकार के रोज शिल्प गढ़ रहे हैं। ऐसे में पेपर या प्रिंट पत्रकारिता और उससे भी आगे बढ़कर जातीय पत्रकारिता करना आसान नहीं है। नीर-क्षीर-विवेक को भी झूठे रंगे सियारों ने फेल कर रखा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष सामाजिक, राजनैतिक लाभ लिप्सा से चाटुकारिता करते नहीं थक रहे हैं या वह सब अपने को स्थापित करने में लगे हैं। मुझे भी शौक लग रहा है कि कितने गधे पंजीरी खाने गणतंत्र दिवस परेड पर जायेंगे और मैं बेचारा इतनी पढ़ाई करके अपने कमरे में बैठा हिसाब लगा रहा हूँ कि इन पिछड़ों का क्या होगा जो लोकतंत्र के पचहत्तर साल बीतने पर जिन पर भी विश्वास किये वह अपने, अपनों के ही हितलाभी निकले, यह बड़ा सवाल है। -जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
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