मुद्दा ये होना ही नहीं चाहिए कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं। असल मुद्दा तो ये होना चाहिए कि शंकराचार्य होना ही क्यों चाहिए? एक आम आदमी अपनी मेहनत की रोटी बिना किसी मठ या गद्दी के भी खा सकता है। सवाल सीधा और तीखा है—शंकराचार्य से किसान को क्या फायदा है? क्या कोई शंकराचार्य किसान के सूखे खेत में बारिश करवा सकता है? क्या कोई मौलवी या पादरी अपनी दुआओं से सरहद पर गोलियां रुकवा सकता है? अगर नहीं, तो फिर देश के लिए इनका योगदान क्या है? इसी हकीकत को बयां करती ये पंक्तियाँ गौर करने वाली हैं : खेतों में जो हल चलाए, वो तो बस ‘किसान’ है, मठों में जो हुक्म चलाए, वो कहता ‘भगवान’ है। उसकी फसल को ओले मारें, इसकी मौज निराली है, किसान की झोली खाली, इसकी तिजोरी सोने वाली है। कोई चोगा पहन के बैठा, कोई पहने है भगवा, कोई चूमता हाथ है, कोई फैला रहा है अफवा। जन्नत का ये नक्शा बेचें, स्वर्ग का ये पास दें, खुद एसी में सोते हैं, और तुमको बस उपवास दें! न ये बारिश ला सकते हैं, न ये युद्ध रुकवाएंगे, पर सियासत की मेजों पर, ये सबसे पहले आएंगे। पसीने की खुशबू को इन्होंने ‘मलीद’ बताया है, ठगी को ही इन सबने ‘विश्व-गुरु’ का नाम दिया है।
ईश्वर के ये स्वयंभू प्रतिनिधि :
दुनिया के तमाम पंडित, पुरोहित, पादरी, पोप, लामा और मौलवी जो खुद को ईश्वर का एजेंट होने का दावा करते हैं, वे दरअसल एक संगठित दुकान चला रहे हैं। ये अनाज नहीं उगाते, ये ‘परजीवी’ हैं, जो बिना कुछ किए-धरे उस भव्यता और शान-शौकत में रहते हैं जो कभी राजा-महाराजाओं के महलों में हुआ करती थी। सत्ता इनके चरणों में पड़ी रहती है क्योंकि इन्हें ‘भीड़’ का इस्तेमाल करना आता है।
वैध ठगी का ‘रिस्क-फ्री’ व्यापार :
या तो पृथ्वी पर हर इंसान ईश्वर का प्रतिनिधि है, या फिर कोई नहीं! भारत में धर्मगुरुओं के व्यवसाय जैसा और कोई व्यवसाय नहीं। आलीशान भवन, विदेश यात्राएं और सत्ता का संरक्षण—इनके किलों और डेरों में वही ऐय्याशी है जो कभी सामंतों के पास थी।
ये कभी आत्महत्या नहीं करते… जानते हैं क्यों? क्योंकि इनकी फसल पर कभी ओले नहीं पड़ते। इन्हें रात के अंधेरे में ठिठुरते हुए गेहूं में पानी नहीं लगाना पड़ता। इन्हें परिश्रम करने की जरूरत नहीं, क्योंकि इन्हें ‘वैध ठगी’ की कला आती है। यह वर्ग मेहनत-मजदूरी से हमेशा कटा रहा, जबकि कृषक वर्ग कठोर परिश्रम करते हुए भी कर्ज के दलदल में धंसता गया।
सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना :
हमारी सभ्यता की कहानी बस इतनी ही है कि जो ‘श्रमहीन और अनुत्पादक’ था, वह श्रेष्ठ और पूज्य होता चला गया, और जो ‘श्रेष्ठ श्रमशील किसान’ था, वह हीन और दरिद्र होकर समाज के सबसे निचले पायदान पर पहुँच गया। यही है विश्व-गुरु बनने की असली दास्तान। समझो ठगी के इस पावर गेम को!
-राजेश कुमार पाल, इंदौर
बीमा वाला एवं सामाजिक चिंतक
मो. 9424831940
ठगी का पावर गेम : समझो सभ्यता की इस उलटी कहानी को!
ठगी का पावर गेम : समझो सभ्यता की इस उलटी कहानी को!
मुद्दा ये होना ही नहीं चाहिए कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं। असल मुद्दा तो ये होना चाहिए कि शंकराचार्य होना ही क्यों चाहिए? एक आम आदमी अपनी मेहनत की रोटी बिना किसी मठ या गद्दी के भी खा सकता है। सवाल सीधा और तीखा है—शंकराचार्य से किसान को क्या फायदा है? क्या कोई शंकराचार्य किसान के सूखे खेत में बारिश करवा सकता है? क्या कोई मौलवी या पादरी अपनी दुआओं से सरहद पर गोलियां रुकवा सकता है? अगर नहीं, तो फिर देश के लिए इनका योगदान क्या है? इसी हकीकत को बयां करती ये पंक्तियाँ गौर करने वाली हैं : खेतों में जो हल चलाए, वो तो बस ‘किसान’ है, मठों में जो हुक्म चलाए, वो कहता ‘भगवान’ है। उसकी फसल को ओले मारें, इसकी मौज निराली है, किसान की झोली खाली, इसकी तिजोरी सोने वाली है। कोई चोगा पहन के बैठा, कोई पहने है भगवा, कोई चूमता हाथ है, कोई फैला रहा है अफवा। जन्नत का ये नक्शा बेचें, स्वर्ग का ये पास दें, खुद एसी में सोते हैं, और तुमको बस उपवास दें! न ये बारिश ला सकते हैं, न ये युद्ध रुकवाएंगे, पर सियासत की मेजों पर, ये सबसे पहले आएंगे। पसीने की खुशबू को इन्होंने ‘मलीद’ बताया है, ठगी को ही इन सबने ‘विश्व-गुरु’ का नाम दिया है।
ईश्वर के ये स्वयंभू प्रतिनिधि :
दुनिया के तमाम पंडित, पुरोहित, पादरी, पोप, लामा और मौलवी जो खुद को ईश्वर का एजेंट होने का दावा करते हैं, वे दरअसल एक संगठित दुकान चला रहे हैं। ये अनाज नहीं उगाते, ये ‘परजीवी’ हैं, जो बिना कुछ किए-धरे उस भव्यता और शान-शौकत में रहते हैं जो कभी राजा-महाराजाओं के महलों में हुआ करती थी। सत्ता इनके चरणों में पड़ी रहती है क्योंकि इन्हें ‘भीड़’ का इस्तेमाल करना आता है।
वैध ठगी का ‘रिस्क-फ्री’ व्यापार :
या तो पृथ्वी पर हर इंसान ईश्वर का प्रतिनिधि है, या फिर कोई नहीं! भारत में धर्मगुरुओं के व्यवसाय जैसा और कोई व्यवसाय नहीं। आलीशान भवन, विदेश यात्राएं और सत्ता का संरक्षण—इनके किलों और डेरों में वही ऐय्याशी है जो कभी सामंतों के पास थी।
ये कभी आत्महत्या नहीं करते… जानते हैं क्यों? क्योंकि इनकी फसल पर कभी ओले नहीं पड़ते। इन्हें रात के अंधेरे में ठिठुरते हुए गेहूं में पानी नहीं लगाना पड़ता। इन्हें परिश्रम करने की जरूरत नहीं, क्योंकि इन्हें ‘वैध ठगी’ की कला आती है। यह वर्ग मेहनत-मजदूरी से हमेशा कटा रहा, जबकि कृषक वर्ग कठोर परिश्रम करते हुए भी कर्ज के दलदल में धंसता गया।
सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना :
हमारी सभ्यता की कहानी बस इतनी ही है कि जो ‘श्रमहीन और अनुत्पादक’ था, वह श्रेष्ठ और पूज्य होता चला गया, और जो ‘श्रेष्ठ श्रमशील किसान’ था, वह हीन और दरिद्र होकर समाज के सबसे निचले पायदान पर पहुँच गया। यही है विश्व-गुरु बनने की असली दास्तान। समझो ठगी के इस पावर गेम को!
-राजेश कुमार पाल, इंदौर
बीमा वाला एवं सामाजिक चिंतक
मो. 9424831940
