Wednesday, March 4, 2026

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लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा का वाराणसी में ध्वस्तीकरण : प्रशासनिक निर्णय या सांस्कृतिक असंवेदनशीलता?

भारतीय इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल किसी कालखंड तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सदियों तक समाज की चेतना को दिशा देते हैं। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ऐसा ही एक नाम है। न्याय, धर्म, करुणा और राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता की प्रतीक अहिल्याबाई ने न केवल मालवा क्षेत्र का सुशासन किया, बल्कि पूरे भारतवर्ष में सनातन धर्म के संरक्षण और पुनर्स्थापन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। ऐसे में यदि वाराणसी मणिकर्णिका घाट जैसे पवित्र नगर में लोकमाता देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा को प्रशासनिक कार्रवाई के अंतर्गत ध्वस्त किया गया है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह कदम केवल एक तकनीकी निर्णय था या फिर हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रति असंवेदनशीलता का उदाहरण? देवी अहिल्याबाई होलकर ने काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, द्वारका, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, गया, उज्जैन सहित देश के अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों में मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण एवं पुनर्निर्माण कराया। उस दौर में, जब आक्रांताओं द्वारा अनेक धार्मिक स्थलों को क्षति पहुँचाई गई थी, अहिल्याबाई ने अपने निजी कोष और संकल्प से सनातन संस्कृति की पुनर्स्थापना का बीड़ा उठाया। वे पाल, बघेल, धनगर (गड़ेरी) समाज में जन्मीं एक साधारण कन्या थीं, जिन्होंने अपने कर्म, विवेक और सेवा से ‘लोकमाता’ का गौरव प्राप्त किया। उनका शासन किसी वर्ग, जाति या संप्रदाय के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिए समर्पित था। इसलिए उनकी प्रतिमा केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, नारी सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। वाराणसी, जिसे सनातन संस्कृति की आत्मा कहा जाता है, उसी नगरी में देवी अहिल्याबाई से जुड़ी प्रतिमा या स्मृति-स्थल को बिना व्यापक संवाद, सामाजिक सहमति और वैकल्पिक समाधान के ध्वस्त करना कई प्रश्न खड़े करता है। क्या विकास और सौंदर्यीकरण की प्रक्रिया में हमारी ऐतिहासिक चेतना को कुचलना आवश्यक है? क्या प्रशासनिक नियम जनभावनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों से ऊपर हो सकते हैं? लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन का दायित्व केवल कानून का पालन कराना नहीं, बल्कि समाज की भावनाओं का सम्मान करना भी है। यदि किसी कारणवश स्थान परिवर्तन या पुनर्व्यवस्था आवश्यक थी, तो प्रतिमा के संरक्षण, पुनर्स्थापन और सम्मानजनक विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए था। ध्वस्तीकरण जैसे कठोर कदम से जनमानस में आक्रोश और पीड़ा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन इस विषय पर स्पष्ट, संवेदनशील और जिम्मेदार संवाद करे। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति के प्रति सम्मान केवल मूर्ति से नहीं, बल्कि हमारे निर्णयों और व्यवहार से भी झलकना चाहिए। विकास तभी सार्थक है, जब वह विरासत को साथ लेकर चले—उसे तोड़कर नहीं। देवी अहिल्याबाई का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता सेवा का माध्यम होती है और धर्म मानवता की रक्षा का मार्ग। उनके नाम से जुड़ी किसी भी स्मृति का अपमान, वास्तव में हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत का अपमान है। ऐसे में यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक जिम्मेदारी का है जिस पर गंभीर आत्ममंथन आवश्यक है।
-योगाचार्य महेश पाल
विमुक्त घुमक्कड़ अर्ध घुमक्कड़ महासंघ प्रदेश प्रवक्ता, भोपाल संभाग प्रभारी, खेलो इंडिया जज, 21000 सूर्य नमस्कार के लिए पुरस्कृत
मो. 7354849540

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लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा का वाराणसी में ध्वस्तीकरण : प्रशासनिक निर्णय या सांस्कृतिक असंवेदनशीलता?

भारतीय इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल किसी कालखंड तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सदियों तक समाज की चेतना को दिशा देते हैं। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर ऐसा ही एक नाम है। न्याय, धर्म, करुणा और राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता की प्रतीक अहिल्याबाई ने न केवल मालवा क्षेत्र का सुशासन किया, बल्कि पूरे भारतवर्ष में सनातन धर्म के संरक्षण और पुनर्स्थापन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। ऐसे में यदि वाराणसी मणिकर्णिका घाट जैसे पवित्र नगर में लोकमाता देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा को प्रशासनिक कार्रवाई के अंतर्गत ध्वस्त किया गया है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह कदम केवल एक तकनीकी निर्णय था या फिर हमारी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रति असंवेदनशीलता का उदाहरण? देवी अहिल्याबाई होलकर ने काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, द्वारका, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, गया, उज्जैन सहित देश के अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों में मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण एवं पुनर्निर्माण कराया। उस दौर में, जब आक्रांताओं द्वारा अनेक धार्मिक स्थलों को क्षति पहुँचाई गई थी, अहिल्याबाई ने अपने निजी कोष और संकल्प से सनातन संस्कृति की पुनर्स्थापना का बीड़ा उठाया। वे पाल, बघेल, धनगर (गड़ेरी) समाज में जन्मीं एक साधारण कन्या थीं, जिन्होंने अपने कर्म, विवेक और सेवा से ‘लोकमाता’ का गौरव प्राप्त किया। उनका शासन किसी वर्ग, जाति या संप्रदाय के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिए समर्पित था। इसलिए उनकी प्रतिमा केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, नारी सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। वाराणसी, जिसे सनातन संस्कृति की आत्मा कहा जाता है, उसी नगरी में देवी अहिल्याबाई से जुड़ी प्रतिमा या स्मृति-स्थल को बिना व्यापक संवाद, सामाजिक सहमति और वैकल्पिक समाधान के ध्वस्त करना कई प्रश्न खड़े करता है। क्या विकास और सौंदर्यीकरण की प्रक्रिया में हमारी ऐतिहासिक चेतना को कुचलना आवश्यक है? क्या प्रशासनिक नियम जनभावनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों से ऊपर हो सकते हैं? लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन का दायित्व केवल कानून का पालन कराना नहीं, बल्कि समाज की भावनाओं का सम्मान करना भी है। यदि किसी कारणवश स्थान परिवर्तन या पुनर्व्यवस्था आवश्यक थी, तो प्रतिमा के संरक्षण, पुनर्स्थापन और सम्मानजनक विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए था। ध्वस्तीकरण जैसे कठोर कदम से जनमानस में आक्रोश और पीड़ा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन इस विषय पर स्पष्ट, संवेदनशील और जिम्मेदार संवाद करे। लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति के प्रति सम्मान केवल मूर्ति से नहीं, बल्कि हमारे निर्णयों और व्यवहार से भी झलकना चाहिए। विकास तभी सार्थक है, जब वह विरासत को साथ लेकर चले—उसे तोड़कर नहीं। देवी अहिल्याबाई का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता सेवा का माध्यम होती है और धर्म मानवता की रक्षा का मार्ग। उनके नाम से जुड़ी किसी भी स्मृति का अपमान, वास्तव में हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत का अपमान है। ऐसे में यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक जिम्मेदारी का है जिस पर गंभीर आत्ममंथन आवश्यक है।
-योगाचार्य महेश पाल
विमुक्त घुमक्कड़ अर्ध घुमक्कड़ महासंघ प्रदेश प्रवक्ता, भोपाल संभाग प्रभारी, खेलो इंडिया जज, 21000 सूर्य नमस्कार के लिए पुरस्कृत
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