Monday, March 2, 2026

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मानव अस्तित्व की गरिमा मानव अधिकारों के केंद्र में है : प्रो. अमर सिंह

चांद कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस पर कार्यशाला का आयोजन

छिंदवाड़ा। चांद कॉलेज में राष्ट्रीय सेवा योजना और रेड रिबन विभाग के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस पर व्याख्यान आयोजित किया गया। प्राचार्य प्रो. अमर सिंह ने कहा कि जीवन जीने के बुनियादी अधिकार मानव अधिकार होते हैं जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। मानव अधिकारों के केंद्र में मानव अस्तित्व की गरिमा का संरक्षण है जिसमें स्वतन्त्रता, समानता व बंधुता का केंद्रीय भाव समाहित है। मानव कलंक, दासता व भेदभाव की चुनौतियों से निजात पाना मानव को विधायी रूप से समर्थित अधिकार हैं। प्रो. रजनी कवरेती ने अपने उद््बोधन में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म और राष्ट्रीयता के आधार पर मानव अधिकारों का अधिकारी होता है जिन्हें समाज मान्यता प्रदान करता है। प्रो. लक्ष्मण उइके ने कहा कि खुद के लिए लड़ना व दूसरों के मूल्यों को समझना ही मानव अधिकार की सही परिभाषा है। प्रो. जी.एल. विश्वकर्मा के अनुसार आज़ादी, समानता, धार्मिक चुनाव शोषण के खिलाफ आवाज़ व सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण हेतु मूलभूत संवैधानिक अधिकार हैं। प्रो. सकर लाल बट्टी ने अमर्यादित आचरण, रंगभेद, शोषण व धार्मिक गुलामी को मानव अधिकारों का उल्लंघन बताया। प्रो. सुरेखा तेलकर ने स्वयं को नेक बनाने, जगत को जन्नत में बदलने, सद्भावना व नैतिक व्यवहार को बढ़ावा देने पर बल दिया। प्रो. रक्षा उपश्याम ने वंचितों के अधिकारों के हनन, बाल विवाह, बाल मजदूरी, छुआछूत व बिगड़ते सामाजिक सद्भाव पर विस्तृत चर्चा की। -ब्यूरो

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मानव अस्तित्व की गरिमा मानव अधिकारों के केंद्र में है : प्रो. अमर सिंह

चांद कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस पर कार्यशाला का आयोजन

छिंदवाड़ा। चांद कॉलेज में राष्ट्रीय सेवा योजना और रेड रिबन विभाग के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस पर व्याख्यान आयोजित किया गया। प्राचार्य प्रो. अमर सिंह ने कहा कि जीवन जीने के बुनियादी अधिकार मानव अधिकार होते हैं जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। मानव अधिकारों के केंद्र में मानव अस्तित्व की गरिमा का संरक्षण है जिसमें स्वतन्त्रता, समानता व बंधुता का केंद्रीय भाव समाहित है। मानव कलंक, दासता व भेदभाव की चुनौतियों से निजात पाना मानव को विधायी रूप से समर्थित अधिकार हैं। प्रो. रजनी कवरेती ने अपने उद््बोधन में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म और राष्ट्रीयता के आधार पर मानव अधिकारों का अधिकारी होता है जिन्हें समाज मान्यता प्रदान करता है। प्रो. लक्ष्मण उइके ने कहा कि खुद के लिए लड़ना व दूसरों के मूल्यों को समझना ही मानव अधिकार की सही परिभाषा है। प्रो. जी.एल. विश्वकर्मा के अनुसार आज़ादी, समानता, धार्मिक चुनाव शोषण के खिलाफ आवाज़ व सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण हेतु मूलभूत संवैधानिक अधिकार हैं। प्रो. सकर लाल बट्टी ने अमर्यादित आचरण, रंगभेद, शोषण व धार्मिक गुलामी को मानव अधिकारों का उल्लंघन बताया। प्रो. सुरेखा तेलकर ने स्वयं को नेक बनाने, जगत को जन्नत में बदलने, सद्भावना व नैतिक व्यवहार को बढ़ावा देने पर बल दिया। प्रो. रक्षा उपश्याम ने वंचितों के अधिकारों के हनन, बाल विवाह, बाल मजदूरी, छुआछूत व बिगड़ते सामाजिक सद्भाव पर विस्तृत चर्चा की। -ब्यूरो

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