धीरे-धीरे हो गया, अब जाड़े का अंत।
फूलों पर मुस्कान ले, आया आज बसंत।।-1
घर में घुस-घुस कर रहा, शीत वार पर वार।
मधु ऋतु में इस दुष्ट की, निश्चित होगी हार।।-2
सहमे-सहमे दिन कटे, काँप-काँप कर रात।
मधु ऋतु में अलि पूछते, सरसों से कुशलात।।-3
निष्ठुर जाड़ा भग गया, कलियाँ हुईं जवान।
मधु ऋतु में आने लगी, फूलों में मुस्कान।।-4
गुलमोहर, ट्यूलिप, लिली, गेंदा और गुलाब।
खिले चमेली डहलिया, मधु ऋतु हुई जनाब।।-5
रंग-बिरंगे गुल खिले, मोहक खुशबूदार।
मानो ऋतुपति कर रहा, धरती का शृंगार।।-6
मधुऋतु में यौवन मिला, आकर्षण की धूम।
ज्यों कलियों के पट खुले, भ्रमर रहे मुख चूम।।-7
दिल को बहुत पसन्द हैं, मधुऋतु के उपहार।
काश! बने ये जिंदगी, इतनी खुशबूदार।।-8
बजा नगाड़ा फाग का, मधुऋतु की है धूम।
फूलों का मेला लगा, भ्रमर रहे हैं झूम।।-9
हल्की-हल्की गुनगुनी, खिली-खिली सी धूप।
इसमें मधुऋतु का लगे, दुल्हन जैसा रूप।।-10
-शिव कुमार ‘दीपक’
बहरदोई, सादाबाद, हाथरस
मो. 8126338096
बसंत पर दोहे…
बसंत पर दोहे…
धीरे-धीरे हो गया, अब जाड़े का अंत।
फूलों पर मुस्कान ले, आया आज बसंत।।-1
घर में घुस-घुस कर रहा, शीत वार पर वार।
मधु ऋतु में इस दुष्ट की, निश्चित होगी हार।।-2
सहमे-सहमे दिन कटे, काँप-काँप कर रात।
मधु ऋतु में अलि पूछते, सरसों से कुशलात।।-3
निष्ठुर जाड़ा भग गया, कलियाँ हुईं जवान।
मधु ऋतु में आने लगी, फूलों में मुस्कान।।-4
गुलमोहर, ट्यूलिप, लिली, गेंदा और गुलाब।
खिले चमेली डहलिया, मधु ऋतु हुई जनाब।।-5
रंग-बिरंगे गुल खिले, मोहक खुशबूदार।
मानो ऋतुपति कर रहा, धरती का शृंगार।।-6
मधुऋतु में यौवन मिला, आकर्षण की धूम।
ज्यों कलियों के पट खुले, भ्रमर रहे मुख चूम।।-7
दिल को बहुत पसन्द हैं, मधुऋतु के उपहार।
काश! बने ये जिंदगी, इतनी खुशबूदार।।-8
बजा नगाड़ा फाग का, मधुऋतु की है धूम।
फूलों का मेला लगा, भ्रमर रहे हैं झूम।।-9
हल्की-हल्की गुनगुनी, खिली-खिली सी धूप।
इसमें मधुऋतु का लगे, दुल्हन जैसा रूप।।-10
-शिव कुमार ‘दीपक’
बहरदोई, सादाबाद, हाथरस
मो. 8126338096
