15 फरवरी को समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय पर आयोजित एक समारोह में सैकड़ों लोगों ने सपा की सदस्यता ग्रहण की, इनमें पूर्व विधायक राजकुमार पाल सहित हमारे समाज के अनेक नेता भी शामिल थे। उल्लेखनीय है कि राजकुमार पाल इससे पूर्व अपना दल (एस) के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं लेकिन किन्हीं कारणों से उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था, उसके बाद से उनके विभिन्न दलों में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन अंतत: उन्होंने सपा में शामिल होना ही ज्यादा बेहतर समझा। वैसे, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब मुख्यत: दो ही दल सत्ता की दावेदारी के लिए प्रयासरत माने जाते हैं जिनमें भारतीय जनता पार्टी के बाद समाजवादी पार्टी का ही नाम आता है। समय के साथ अन्य सभी दल हाशिये पर चले गए हैं। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में इन्हीं दो दलों के बीच सत्ता का संघर्ष होने की प्रबल संभावना है। जहां तक पाल-बघेल-गडरिया समाज की बात है तो इस समाज के नेता लगभग सभी दलों में सक्रिय हैं, उत्तर प्रदेश में चूँकि भाजपा सत्ताधारी दल है इसलिए समाज के अधिकांश लोगों का झुकाव भाजपा की ही तरफ है। लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों से पाल समाज का भाजपा से मोहभंग हुआ है और स्वाभाविक तौर पर अब वे सपा के पाले में ही जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि हमारे समाज की कई राजनीतिक पार्टियां भी उत्तर प्रदेश में सक्रिय हैं जिनमें मुख्य रूप से राष्टÑीय समाज पक्ष, राष्टÑ उदय पार्टी, राष्टÑीय शोषित समाज पार्टी, सर्वोदय क्रांति पार्टी आदि के नाम लिए जा सकते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी पार्टी अभी तक अपना संगठन इस स्तर तक नहीं खड़ा कर सकी है कि वह सत्ता की दौड़ में शामिल मानी जा सके। राष्टÑीय समाज पक्ष के संस्थापक अध्यक्ष महादेव जानकर ने पिछले कुछ समय में अपनी पार्टी की उत्तर प्रदेश में जड़ें मजबूत करने के लिए काफी प्रयास किए थे और कुछ हद तक उन्हें सफलता भी मिली थी लेकिन सही नेतृत्व के अभाव में रासपा का संगठन ज्यादा मजबूत नहीं हो पाया। यदि महादेव जानकर को उत्तर प्रदेश में पार्टी को मजबूत बनाना है तो उन्हें ठोस रणनीति बनाकर कार्य करना होगा।
इस हफ्ते इन्हीं शब्दों के साथ जय पाल समाज!
-निरंजन सिंह पाल
समाज का सच्चा हितैषी कौन?
समाज का सच्चा हितैषी कौन?
15 फरवरी को समाजवादी पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय पर आयोजित एक समारोह में सैकड़ों लोगों ने सपा की सदस्यता ग्रहण की, इनमें पूर्व विधायक राजकुमार पाल सहित हमारे समाज के अनेक नेता भी शामिल थे। उल्लेखनीय है कि राजकुमार पाल इससे पूर्व अपना दल (एस) के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं लेकिन किन्हीं कारणों से उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था, उसके बाद से उनके विभिन्न दलों में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे थे लेकिन अंतत: उन्होंने सपा में शामिल होना ही ज्यादा बेहतर समझा। वैसे, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब मुख्यत: दो ही दल सत्ता की दावेदारी के लिए प्रयासरत माने जाते हैं जिनमें भारतीय जनता पार्टी के बाद समाजवादी पार्टी का ही नाम आता है। समय के साथ अन्य सभी दल हाशिये पर चले गए हैं। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में इन्हीं दो दलों के बीच सत्ता का संघर्ष होने की प्रबल संभावना है। जहां तक पाल-बघेल-गडरिया समाज की बात है तो इस समाज के नेता लगभग सभी दलों में सक्रिय हैं, उत्तर प्रदेश में चूँकि भाजपा सत्ताधारी दल है इसलिए समाज के अधिकांश लोगों का झुकाव भाजपा की ही तरफ है। लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों से पाल समाज का भाजपा से मोहभंग हुआ है और स्वाभाविक तौर पर अब वे सपा के पाले में ही जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि हमारे समाज की कई राजनीतिक पार्टियां भी उत्तर प्रदेश में सक्रिय हैं जिनमें मुख्य रूप से राष्टÑीय समाज पक्ष, राष्टÑ उदय पार्टी, राष्टÑीय शोषित समाज पार्टी, सर्वोदय क्रांति पार्टी आदि के नाम लिए जा सकते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी पार्टी अभी तक अपना संगठन इस स्तर तक नहीं खड़ा कर सकी है कि वह सत्ता की दौड़ में शामिल मानी जा सके। राष्टÑीय समाज पक्ष के संस्थापक अध्यक्ष महादेव जानकर ने पिछले कुछ समय में अपनी पार्टी की उत्तर प्रदेश में जड़ें मजबूत करने के लिए काफी प्रयास किए थे और कुछ हद तक उन्हें सफलता भी मिली थी लेकिन सही नेतृत्व के अभाव में रासपा का संगठन ज्यादा मजबूत नहीं हो पाया। यदि महादेव जानकर को उत्तर प्रदेश में पार्टी को मजबूत बनाना है तो उन्हें ठोस रणनीति बनाकर कार्य करना होगा।
इस हफ्ते इन्हीं शब्दों के साथ जय पाल समाज!
-निरंजन सिंह पाल
