आने वाली 4 मार्च को होली और 8 मार्च को रंग पंचमी पर्व है। होली का पर्व भक्त प्रहलाद और भगवान नरसिंह से जुड़ा हुआ है। यह पर्व राधा-कृष्ण से भी जुड़ा हुआ है जो कि भौतिक जगत का प्रतीकात्मक रंगों का त्यौहार है। आदिकाल में यह पर्व भगवान नरसिंह के अवतार के साथ उनके पूजन-अर्चन व नमन-वंदन का पर्व था। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक रंग का शरीर पर लेपन और विश्व रूप परमात्मा के स्वरूप में नर-पशु सभी के साथ एकात्म भाव से सद्भावना का विस्तार करना, प्रकृति का संरक्षण करना, जल को संरक्षित और शुद्ध रखना आदि के लिए प्रमुख रूप से था। कालांतर में यह आक्रांताओं के कारण कलुषित होता चला गया। होली के नाम पर पशुओं की हत्या, मदिरा का सेवन, वृक्षों को अवैध रूप से काटकर जलाने की कुरीति और गाली-गलौज करने की प्रवृत्ति बन गई। आज रंगों के स्थान पर अनेक प्रकार के केमिकल प्रयोग किए जाते हैं जो व्यक्तियों की त्वचा के लिए हानिप्रद होते हंै। शराब के प्रचलन से अनेक लोग असमय पर्व के नाम पर काल के गाल में समा जाते हैं। न जाने कितने लोग होली पर लोगों की हत्या कर देते हैं, बेटियों का बलात्कार कर देते हैं और जीवनभर जेल में पड़े रहते हैं। ऐसी होली मनाने से सर्वथा परहेज करें। होली का पर्व तो अनेकता में एकता व सद्भावना का पर्व है। यह पर्व ऋतु परिवर्तन का पर्व है। होली की रात्रि महरात्रि कहलाती है, इस दिन शुद्ध और पवित्र होकर विश्व रूप परमात्मा का ध्यान करना चाहिए, सदाचार के पालन का संकल्प लेना चाहिए, गायत्री का ध्यान जप करना चाहिए, प्रहलाद हरिभक्त थे, सदाचारी थे, हमें उनका अनुसरण करना चाहिए। बाजार में बिकने वाले रंगों से नहीं बल्कि पलाश के फूलों से होली खेलनी चाहिए। फूलों के रंग से होली खेलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। वे लोग बड़े सौभाग्यशाली होते हैं जो अपने माता-पिता, पति-पत्नी और बच्चों के साथ सादगी से पर्व मनाते हैं, घर में एक साथ रहते हैं, एक-दूसरे को प्राकृतिक रंग लगाते हैं और आत्मिक रंग से रंग जाते हैं। ऐसे लोग दुर्भाग्यशाली होते हैं जो पर्व के नाम पर निर्दोष पशु-पक्षियों की हत्या करते हैं और उनको क्रूर जानवर की भांति नोच-नोच कर खाते हैं, नशे का सेवन करते हैं और अपनी जान गवां बैठते हैं। अभद्र गालियां देकर अनावश्यक लोगों से दुश्मनी लेते और अपने विकास, उन्नति व प्रगति में स्वयं ही बाधक बन जाते हैं। जो लोग दूरदृष्टि से, तत्व दृष्टि से मानते हैं और उसके पश्चात चैत्र बसंती नवरात्रि पर्व भी उत्साहपूर्वक मनाने का अवसर प्राप्त करते हैं उनका स्वास्थ्य, उनका भविष्य उज्ज्वल बनता है। होली उत्सव के पावन अवसर पर हम आप सबके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करते हुए बस आपसे यही सुझाव प्रस्तुत करते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए होली मनाने के लिए थोड़ी सतर्कता बरतें, सावधान रहें क्योंकि होली का पर्व विकृत होता चला जा रहा है। आप स्वयं बचें, अपने परिवार को व अपने बच्चों को बचाने का प्रयास करें। व्यसन मुक्त आदर्श होली मनाएं। स्वस्थ, सुखी और सम्मानित जीवन की ओर आगे बढ़ें।
-नारायण प्रसाद पाली
प्रांतीय प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़
मो. 9575761235
सावधान : होली के विकृत स्वरूप से स्वयं को बचाएं!
सावधान : होली के विकृत स्वरूप से स्वयं को बचाएं!
आने वाली 4 मार्च को होली और 8 मार्च को रंग पंचमी पर्व है। होली का पर्व भक्त प्रहलाद और भगवान नरसिंह से जुड़ा हुआ है। यह पर्व राधा-कृष्ण से भी जुड़ा हुआ है जो कि भौतिक जगत का प्रतीकात्मक रंगों का त्यौहार है। आदिकाल में यह पर्व भगवान नरसिंह के अवतार के साथ उनके पूजन-अर्चन व नमन-वंदन का पर्व था। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक रंग का शरीर पर लेपन और विश्व रूप परमात्मा के स्वरूप में नर-पशु सभी के साथ एकात्म भाव से सद्भावना का विस्तार करना, प्रकृति का संरक्षण करना, जल को संरक्षित और शुद्ध रखना आदि के लिए प्रमुख रूप से था। कालांतर में यह आक्रांताओं के कारण कलुषित होता चला गया। होली के नाम पर पशुओं की हत्या, मदिरा का सेवन, वृक्षों को अवैध रूप से काटकर जलाने की कुरीति और गाली-गलौज करने की प्रवृत्ति बन गई। आज रंगों के स्थान पर अनेक प्रकार के केमिकल प्रयोग किए जाते हैं जो व्यक्तियों की त्वचा के लिए हानिप्रद होते हंै। शराब के प्रचलन से अनेक लोग असमय पर्व के नाम पर काल के गाल में समा जाते हैं। न जाने कितने लोग होली पर लोगों की हत्या कर देते हैं, बेटियों का बलात्कार कर देते हैं और जीवनभर जेल में पड़े रहते हैं। ऐसी होली मनाने से सर्वथा परहेज करें। होली का पर्व तो अनेकता में एकता व सद्भावना का पर्व है। यह पर्व ऋतु परिवर्तन का पर्व है। होली की रात्रि महरात्रि कहलाती है, इस दिन शुद्ध और पवित्र होकर विश्व रूप परमात्मा का ध्यान करना चाहिए, सदाचार के पालन का संकल्प लेना चाहिए, गायत्री का ध्यान जप करना चाहिए, प्रहलाद हरिभक्त थे, सदाचारी थे, हमें उनका अनुसरण करना चाहिए। बाजार में बिकने वाले रंगों से नहीं बल्कि पलाश के फूलों से होली खेलनी चाहिए। फूलों के रंग से होली खेलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। वे लोग बड़े सौभाग्यशाली होते हैं जो अपने माता-पिता, पति-पत्नी और बच्चों के साथ सादगी से पर्व मनाते हैं, घर में एक साथ रहते हैं, एक-दूसरे को प्राकृतिक रंग लगाते हैं और आत्मिक रंग से रंग जाते हैं। ऐसे लोग दुर्भाग्यशाली होते हैं जो पर्व के नाम पर निर्दोष पशु-पक्षियों की हत्या करते हैं और उनको क्रूर जानवर की भांति नोच-नोच कर खाते हैं, नशे का सेवन करते हैं और अपनी जान गवां बैठते हैं। अभद्र गालियां देकर अनावश्यक लोगों से दुश्मनी लेते और अपने विकास, उन्नति व प्रगति में स्वयं ही बाधक बन जाते हैं। जो लोग दूरदृष्टि से, तत्व दृष्टि से मानते हैं और उसके पश्चात चैत्र बसंती नवरात्रि पर्व भी उत्साहपूर्वक मनाने का अवसर प्राप्त करते हैं उनका स्वास्थ्य, उनका भविष्य उज्ज्वल बनता है। होली उत्सव के पावन अवसर पर हम आप सबके उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना करते हुए बस आपसे यही सुझाव प्रस्तुत करते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए होली मनाने के लिए थोड़ी सतर्कता बरतें, सावधान रहें क्योंकि होली का पर्व विकृत होता चला जा रहा है। आप स्वयं बचें, अपने परिवार को व अपने बच्चों को बचाने का प्रयास करें। व्यसन मुक्त आदर्श होली मनाएं। स्वस्थ, सुखी और सम्मानित जीवन की ओर आगे बढ़ें।
-नारायण प्रसाद पाली
प्रांतीय प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़
मो. 9575761235
