Monday, March 2, 2026

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समाज सेवा में पारखंड क्यों?

इस जीवन जगत में जी रहे जो भी लोग हैं उन्हें सुख-दु:ख से गुजरना ही पड़ेगा, इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। ‘कठिन कर्म गति जान विधाता, जो शुभ अशुभ सकल फल दाता।’ जीवन में यदि स्वीकार का उदय हो जाये और व्यक्ति समझ ले कि मुझे या किसी को जो कुछ मिल रहा है, उसी का मैं या वह पात्र था, तो ऐसी सारी समस्याओं या घटनाओं से सुधीजन, विवेकीजन कभी विचलित नहीं होते हैं। आजकल मल्टीमीडिया युग में लोग एक उद्देश्य पर कायम नहीं रह पाते हैं। अपनी-अपनी सोच से नये-नये समयापेक्षी उद्देश्य भावना में, जजबात में आ करके गढ़ने लगते हैं और भूल जाते हैं कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए अनावश्यक और नये सिद्धांत गढ़ने से सभी हमारे अनुरूप चलने लगेंगे या मेरा कहना मानकर सभी हमें सही ठहरायेंगें, कदापि नहीं। मैं जजबाती कम ही हूँ। समाजसेवा में लिए एक व्रत को पूरा न कर पाने की दशा में नये प्रयोग करने का कतई समर्थन नहीं कर सकता। इस सृष्टि में सब समझकर अच्छा प्रयोग करते हैं, जैसे बिहार में पी.के. जन सुराज पार्टी का और राहुल गांधी का मानना है कि सब घटनाओं को बीजेपी द्वारा ही करवाया जा रहा है जनमत के लिए। लेकिन समय में गढ़े जा रहे सिद्धांत सही नहीं होते हैं। इसलिए कर्ताभाव छोड़कर मैं समूहों में जजबाती अपीलों से धन इकट्ठा करके समाजसेवा करने को आडंबर से अधिक कोई स्थान देना नहीं चाहता। लोकतंत्र में जनता के उत्थान व सहयोग के लिए सरकारी सिस्टम है, वह बाकायदा सुख-दुख में जनसामान्य का सहयोग कर रहा है। मैं अपने समूह में कितने ही लोगों को मना कर चुका हूँ, मैं नाम नहीं लूंगा। एक ने कहा-सर मैं अच्छा रिश्ता तय कराने के लिए पैसा थोड़ा ले लेता हूँ, इस प्रकार तो आप से तो नहीं ले रहा हूँ, आप क्यों मेरे बारे में ऐसा लिखते हैं? तो मैंने कहा-जैसे आप समूह बनाकर पैसा लेते हैं ऐसे ही मैं अपने लेखन से आपके गलत को गलत ठहराता हूँ। समाजसेवा के नाम पर इस तरह राजनीति करने वाले कितने ही लोग समाज को लूटते आए हैं। इसे किसी को तो रोकना पड़ेगा। आगरा में धनगर झूठा आन्दोलन करने वाले लोगों ने कितना समाज का गौरव बोध गिराया है, यही हाल आरक्षण की वकालत करने वालों का है जो आरक्षण पर आरक्षण का लाभ लेकर झूठे नये नरेटिव गढ़ रहे हैं। सच को स्वीकार करना आसान नहीं होता है और स्वीकार न करने से गुटबाजी होती है। ‘काहु न कोउ सुख-दुख करदाता, निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।’ यह लेखन किसी को निरुत्साहित करने के लिए नहीं अपितु सोच समझकर सही समयापेक्षी निर्णय करने के लिए है, कोई कर्ताभाव न करे, सब मिल-जुलकर ठीक करें, लक्ष्य से न भटकें।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
मो. 9794866822

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समाज सेवा में पारखंड क्यों?

इस जीवन जगत में जी रहे जो भी लोग हैं उन्हें सुख-दु:ख से गुजरना ही पड़ेगा, इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। ‘कठिन कर्म गति जान विधाता, जो शुभ अशुभ सकल फल दाता।’ जीवन में यदि स्वीकार का उदय हो जाये और व्यक्ति समझ ले कि मुझे या किसी को जो कुछ मिल रहा है, उसी का मैं या वह पात्र था, तो ऐसी सारी समस्याओं या घटनाओं से सुधीजन, विवेकीजन कभी विचलित नहीं होते हैं। आजकल मल्टीमीडिया युग में लोग एक उद्देश्य पर कायम नहीं रह पाते हैं। अपनी-अपनी सोच से नये-नये समयापेक्षी उद्देश्य भावना में, जजबात में आ करके गढ़ने लगते हैं और भूल जाते हैं कि अपने लक्ष्य को पाने के लिए अनावश्यक और नये सिद्धांत गढ़ने से सभी हमारे अनुरूप चलने लगेंगे या मेरा कहना मानकर सभी हमें सही ठहरायेंगें, कदापि नहीं। मैं जजबाती कम ही हूँ। समाजसेवा में लिए एक व्रत को पूरा न कर पाने की दशा में नये प्रयोग करने का कतई समर्थन नहीं कर सकता। इस सृष्टि में सब समझकर अच्छा प्रयोग करते हैं, जैसे बिहार में पी.के. जन सुराज पार्टी का और राहुल गांधी का मानना है कि सब घटनाओं को बीजेपी द्वारा ही करवाया जा रहा है जनमत के लिए। लेकिन समय में गढ़े जा रहे सिद्धांत सही नहीं होते हैं। इसलिए कर्ताभाव छोड़कर मैं समूहों में जजबाती अपीलों से धन इकट्ठा करके समाजसेवा करने को आडंबर से अधिक कोई स्थान देना नहीं चाहता। लोकतंत्र में जनता के उत्थान व सहयोग के लिए सरकारी सिस्टम है, वह बाकायदा सुख-दुख में जनसामान्य का सहयोग कर रहा है। मैं अपने समूह में कितने ही लोगों को मना कर चुका हूँ, मैं नाम नहीं लूंगा। एक ने कहा-सर मैं अच्छा रिश्ता तय कराने के लिए पैसा थोड़ा ले लेता हूँ, इस प्रकार तो आप से तो नहीं ले रहा हूँ, आप क्यों मेरे बारे में ऐसा लिखते हैं? तो मैंने कहा-जैसे आप समूह बनाकर पैसा लेते हैं ऐसे ही मैं अपने लेखन से आपके गलत को गलत ठहराता हूँ। समाजसेवा के नाम पर इस तरह राजनीति करने वाले कितने ही लोग समाज को लूटते आए हैं। इसे किसी को तो रोकना पड़ेगा। आगरा में धनगर झूठा आन्दोलन करने वाले लोगों ने कितना समाज का गौरव बोध गिराया है, यही हाल आरक्षण की वकालत करने वालों का है जो आरक्षण पर आरक्षण का लाभ लेकर झूठे नये नरेटिव गढ़ रहे हैं। सच को स्वीकार करना आसान नहीं होता है और स्वीकार न करने से गुटबाजी होती है। ‘काहु न कोउ सुख-दुख करदाता, निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।’ यह लेखन किसी को निरुत्साहित करने के लिए नहीं अपितु सोच समझकर सही समयापेक्षी निर्णय करने के लिए है, कोई कर्ताभाव न करे, सब मिल-जुलकर ठीक करें, लक्ष्य से न भटकें।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
मो. 9794866822

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