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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

युद्ध होते रहेंगे पृथ्वी तल!

(मधुगीति 260326)
युद्ध होते रहेंगे पृथ्वी तल,
लहरें बहती रहेंगी हर पल जल;
चिंगारी कितनी जलें अग्नि उर,
वायु कितनी बहेंगी शून्य सिहर!
फुहारें कितनी बहतीं चित्त विवर,
विचार बदलते हैं हर ही प्रहर;
शुद्ध तन मन हैं होते हर ही कहर,
चेतना तरजती है विश्व विचर!
लखो मत ज्यादा जगत क्या होता,
करो निज कर्म जो भी हिय कहता;
संतुलित रखके मन सुदृढ़ रखके,
स्वत्व अपने को भाव शिव लेके!
रण रहे जो भी उऋण करने को,
भोग संस्कारों का कराने को;
समाप्त होंगे समय आने पर,
बोध जब होगा विरति होने पर!
विवश हैं प्राण त्राण की खातिर,
रहे चित्ताणु ताकते गह्वर;
‘मधु’ प्रभु ताण्डव रत भव अम्बर,
नृत्य कर ललित तकत बागेश्वर!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com

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