हमारे देश में सामाजिक और न्यायिक जागरूकता बहुत कम लोगों में है। वास्तविकता से दूर काल्पनिक व्यवस्थाओं में लिप्त केवल कही-सुनी बातों पर महत्व देते हैं जिससे कहीं न कहीं सामाजिक और न्यायिक दूरियां बनाते जाते है। यहां तक कि 100, 200, 500 रुपए और दारू की बोतल के बदले अपने पांच साल के न्यायिक समय को समाप्त कर देते हैं। वह पांच साल पचास साल तक भविष्य को हानि पहुंचाते हैं। जब लोग अपना वोट इन्हीं कारणों से देकर आते हैं तो वह उनके लिए कुछ पल अच्छा होता है। उसके बदले वे समाज, देश, परिवार एवं अपने बच्चों के भविष्य के लिए न्यायिक हानि पहुंचाते हैं जिसे वह समझ भी नहीं पाते हैं। हमारे देश में लोकतंत्र को स्थापित रखना नेताओं का काम नहीं है, हम सबका है। हम सबको सामाजिक और न्यायिक जागरूकता पर बल देना होगा ताकि भविष्य में लोगों को सामाजिक कुरीतियों और न्यायिक व्यवस्थाओं को जानने का मौका मिल सके। समाज में पुरानी व्यवस्थाओं को पकड़कर हम भूल जाते हैं कि कुछ वह व्यवस्थाएं जिनमें किसी न किसी वर्ग को अछूत भी माना जाता है और किसी को अछूत होते हुए पाक-साफ मान लिया जाता है जिससे सामाजिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ न्यायिक दूरियां स्थापित होती जाती हैं। वर्तमान में समय से न्याय न मिलने का सबसे बड़ा यही कारण है। पिछड़े वर्ग से तालुक रखने वाला व्यक्ति अपनी उन्हीं परंपराओं को छोड़ नहीं पाता है जिन्होंने उसे पिछड़ा बनाया। जिसने जागरूकता स्वरूप न्याय पाने की ठान ली उसे न्याय मिला, जो न्याय के लिए किसी और पर निर्भरता स्वीकार कर लेता है वह कभी न्याय पाने का अधिकारी नहीं होता है। हमारे देश में अंतिम व्यक्ति तक न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका तत्पर है जिसमें देश के प्रत्येक नागरिक को संविधानिक अधिकार जो उसे मौलिक अधिकार के रूप में प्राप्त है। जिसे किसी पार्लियामेंट, असेंबली या अन्य संविधानिक संस्थाओं द्वारा समाप्त या कम नहीं किया जा सकता है। सामान्यतया प्रत्येक नागरिक को 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं जिसमें संविधानिक अधिकार उसे न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाता है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 में और 226 में विशेष प्रावधान है। इन्हीं दोनों में आपको 5 रिट और साथ में पीआईएल का स्पेशल प्रोविजन है। इतना देश के प्रत्येक जागरूक को उसे सम्पूर्ण न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त है, जिससे स्वयं को तो न्याय मिलता ही है, साथ ही परिवार, समाज एवं अन्य को भी न्याय मिलने में सहायक भूमिका अदा की जा सकती है। एक अच्छे ईमानदार नागरिक होने के नाते सभी को सामाजिक और न्यायिक जागरूक होना अनिवार्य है। जिस देश में लोग अधिक जागरूक होते है वही देश आगे बढ़ता है। इतिहास गवाह है कि देश या दुनिया को सही नेतृत्व एवं लीडरशिप उसके देश को अलग पहचान दिलाती है। सामान्यतया माना जाता है कि जागरूक व्यक्ति ही समाज का नेतृत्व करता है। जागरूकता का भाव जिस लेवल का होगा उसका समाज उसी लेवल पर विकसित होगा। हमारे देश में संविधानिक तौर पर पिछड़ों को मौके दिए गए कि वह समान रूप से स्थापित हों, किंतु उन्होंने उसी नेतृत्व को महत्व दिया जो स्वयं में सामाजिक और न्यायिक जागरूक नहीं था। जिसने अपना नेतृत्व जागरूक चुना वह आगे बढ़ा और अपना अधिकार पाया। दुर्भाग्य से कहना पड़ रहा है कि आजादी के इतने दिनों बाद भी पिछड़ा, पिछड़ा है, उसका सही कारण यही है। जिस दिन पिछड़ा अपना नेतृत्व किसी जागरूक व्यक्ति का स्वीकार कर लेगा उस दिन वह समानता की श्रेणी में आ जाएगा। अन्यथा आगे भविष्य में भी अपना अधिकार मांगता ही रहेगा। अधिकार मांगा नहीं, छीना जाता है। बस आप अपने साथ-साथ अपना नेतृत्व जागरूक चुनें।
-डॉ सुधीर कुमार पाल
एसोसिएट प्रोफेसर, महर्षि यूनिवर्सिटी
ऑफ इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, नोएडा
मो. 9005566201
सामाजिक और न्यायिक जागरूकता ही उत्थान का सही मार्ग है!
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