हमारा समाज के बुद्धिमानों की समझ में नहीं आता है, वह अपनी हीनतावश दूसरों के माध्यम से अपने प्रदर्शन में लगे रहते हैं इसीलिए उनका वजूद जिले, राज्य या फिर देश में नहीं है। अपने लोगों ने चापलूसी की नई-नई तरकीबों से समाज के गौरव बोध को खो दिया है। यही हाल पूरे देश के अखिल भारतीय स्तर के संगठनों का ही नहीं, विश्व स्तर के संगठनों का भी है, जो समाज के नायकों ने भावनाओं में बनाये हैं। ये नायक समझते हैं कि लोग मेरे कहने से चलें, इसी का लाभ दूसरे उठाते हैं। वह अपनों से विचार-विमर्श कर सर्वमान्य कोई निर्णय नहीं कर पाते हैं। मैंने काफी अरसे से कई मंचों से इस बारे में कहा है लेकिन लोग दूरियां बनाते हैं। इस प्रकार समाज के ये संगठन जनपद, राज्य या फिर देश मे नेतृत्व देने में विफल रहे हैं, क्योंकि एक-दूसरे से ईर्ष्या रखते हैं इसलिए हिसाब नहीं लगा पाते हैं कि कौन सम्मान के लायक है और कौन नहीं? बहुधा वह गंगा गए गंगा दास, जमुना गए जमुना दास बने रहते हैं। ऐसे में समाज कोई बड़ी राजनैतिक भागीदारी किसी से पाए, इसकी कम उम्मीद है। लेकिन आशा ही जीवन है। समाज के विकास, उसको नई दिशा देने के कार्य बंद नहीं करने हैं। इसी में गति ही नहीं सद्गति भी है। इसे समाज का नायक बनने वालों को सोचने के लिए विवश होना पड़ेगा।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822
समाज के विकास, उसको नई दिशा देने के कार्य बंद नहीं करने हैं!
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