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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

आए विलोके कितने लोक!

(मधुगीति 260802 A) 4:30
आए विलोके कितने लोक,
विदेही रहे;
धर देह गेह किए कौतुक,
और चल दिए!
दृष्टा बने वे रहे,
चहे ज्यादा ना किए;
संस्कार जो भी रहे दहे,
दग्ध सुर दिए!
सामान्य कुल में आए,
पढ़े पल्लवित हुए;
सेवा वे देश औ विदेश,
कर प्रचुर गये!
परिवार पुत्र औ कलत्र,
साक्षीवत रहे;
देके सुगंध मंद-मंद,
मोहे वे गए!
सीखे सिखाए स्वर वे दिए,
सुरीले हिये;
‘मधु’ से वे प्रीति किए,
रहे जैसे ना रहे!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com

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