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आस्था के नाम पर गुंडागर्दी क्यों?

वैसे तो हमारा देश धर्मनिरपेक्ष माना जाता है लेकिन इस देश में धर्म के नाम पर लोगों की भावनाएँ बहुत जल्दी आहत हो जाती हैं। देश में सरकार किसी भी पार्टी की हो लेकिन हर सरकार यह पूरा ध्यान रखती है कि किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत न हों। दरअसल, धर्म और जाति की राजनीति ने ही इस देश का बेड़ा गर्क कर रखा है। आजादी के बाद से ही कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक दल मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चलकर लम्बे समय तक राज करते रहे जिसके बाद हिन्दुत्व की विचारधारा को अपनाकर भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता का स्वाद चखा। लगभग सभी राजनीतिक दल जानते हैं कि इस देश में यदि चुनाव जीतना है तो धर्म और जाति की राजनीति करनी ही पड़ेगी। इसकी आड़ में हमारे राजनेता तमाम गलत कार्य करने के बावजूद चुनाव जीत जाते हैं। हाल ही में कांवड़ यात्रा के दौरान धार्मिक आयोजनों की बाढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित आसपास के क्षेत्रों में देखी गई। धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है और इससे किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। लेकिन आस्था के नाम पर हुड़दंग, गुंडागर्दी व असभ्यता का प्रदर्शन किसी भी दशा में उचित नहीं ठहराया जा सकता। कांवड़ यात्रा के दौरान अनेक ऐसी घटनाएँ भी देखने और सुनने को मिलीं जिन्हें कोई भी सभ्य व्यक्ति उचित नहीं ठहरा सकता। कांवड़ियों की गलत हरकतों को पुलिस प्रशासन देखकर भी इसलिए नजरअंदाज कर देता है क्योंकि इससे भारी बवाल होने का अंदेशा बना रहता है। दरअसल, कांवड़ यात्रा में अब केवल धार्मिक आस्थावान लोग ही शामिल नहीं होते, इसमें बड़ी संख्या में असामाजिक तत्व भी शामिल होने लगे हैं। ये वो लोग होते हैं जिनका अपना कोई मान-सम्मान नहीं होता। कांवड़ यात्रा के दौरान इन्हें वो मान-सम्मान मिलता है जिसकी आम दिनों में ये कल्पना भी नहीं कर सकते। ये अराजक तत्व ही मुख्य समस्या हैं जो न केवल पुलिस प्रशासन बल्कि सच्ची धार्मिक आस्था रखने वालों के लिए भी परेशानी पैदा करते हैं। धर्म की आड़ में गुंडागर्दी न हो, इसका सभी को विशेष ध्यान रखना चाहिए।
इस हफ्ते इन्हीं शब्दों के साथ जय पाल समाज!

-निरंजन सिंह पाल

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