देशभर के प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर किया चिंतन-मंथन
तिरुपति। विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू चरवाहा समाज के धनगर, गड़रिया, कुरुबा तथा विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से पहचाने जाने वाले पशुपालक कबीलों की राष्ट्रीय गोलमेज परिषद का आयोजन 12 एवं 13 सितंबर को यहां किया गया। इस दो दिवसीय चिंतन-मंथन में देश के विभिन्न राज्यों से आए समाज के प्रमुख प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं चिंतकों ने भाग लिया। बैठक में इस बात पर गंभीरता से विचार किया गया कि धनगर-गड़रिया-कुरुबा जैसे चरवाहा समुदाय सदियों से भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं, लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश की शासन-व्यवस्था, राजनीतिक संस्थाओं और निर्णय लेने वाली व्यवस्थाओं में इनका प्रतिनिधित्व नगण्य क्यों है। प्रतिनिधियों ने कहा कि इन चरवाहा कबीलों ने सदियों से अपनी भेड़-बकरियों के माध्यम से देश को ऊन, दूध, मांस, जैविक खाद तथा पारंपरिक/देशी औषधीय संसाधन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके बावजूद आज भी अनेक क्षेत्रों में पशुपालकों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कहीं उनकी भेड़-बकरियां चोरी एवं लूट का शिकार हो रही हैं तो कहीं चराई और जंगलों से जुड़े मामलों में उन्हें कठिनाइयों एवं उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
रेनके एवं ईदाते आयोग की सिफारिशों पर अमल की मांग
परिषद में विमुक्त एवं घुमंतू समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भविष्य पर विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि भारत सरकार ने वर्ष 2006 में रेनके आयोग का गठन किया था, जिसने वर्ष 2008 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके बाद वर्ष 2015 में भीखू राम ईदाते की अध्यक्षता में आयोग का गठन हुआ, जिसने वर्ष 2018 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। प्रतिनिधियों ने कहा कि विमुक्त, घुमंतू एवं अर्ध-घुमंतू समुदायों को मुख्यधारा में लाने तथा उनके सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए आयोगों की सिफारिशों को प्रभावी रूप से लागू किया जाना आवश्यक है। परिषद में यह मांग प्रमुखता से उठी कि इन समुदायों को सम्मानजनक एवं प्रभावी प्रतिनिधित्व तथा संवैधानिक संरक्षण उपलब्ध कराने की दिशा में केंद्र सरकार ठोस कदम उठाए।
राष्ट्रीय पहचान के लिए सभी नामों को धनगर नाम से जोड़ने पर सहमति
दो दिवसीय परिषद का एक महत्वपूर्ण निर्णय यह रहा कि देश के विभिन्न राज्यों में धनगर, गड़रिया, कुरुबा और अन्य स्थानीय नामों से पहचाने जाने वाले इन चरवाहा कबीलों के सभी नामों को राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। प्रतिनिधियों ने एकमत होकर कहा कि स्थानीय एवं पारंपरिक नामों की पहचान और सम्मान कायम रखते हुए ‘धनगर’ नाम को राष्ट्रीय स्तर पर इन चरवाहा कबीलों की साझा पहचान के प्रतीक के रूप में स्थापित करने की दिशा में सामूहिक प्रयास किया जाएगा। इससे विभिन्न राज्यों में बिखरे हुए समाज के लोगों को एक साझा मंच पर लाने और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी आवाज को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
पंजाब से बरखा राम ने रखा विमुक्त घुमंतू कबीलों का पक्ष
इस राष्ट्रीय गोलमेज परिषद में पंजाब से विमुक्त जाति वेलफेयर बोर्ड, पंजाब सरकार के चेयरमैन बरखा राम विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने विमुक्त एवं घुमंतू समाज से जुड़े विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। संचालकों सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने उनके विचारों को ध्यानपूर्वक सुना तथा अपने-अपने राज्यों की परिस्थितियों और समस्याओं को भी परिषद के समक्ष रखा। परिषद में इस बात पर भी विस्तार से चर्चा हुई कि देशभर में समाज के हजारों संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, पशुपालन, समाज सुधार एवं अधिकारों के लिए किए जा रहे कार्यों को एक राष्ट्रीय दिशा और साझा मंच प्रदान किया जाए।
देशभर के प्रमुख सामाजिक प्रतिनिधियों की सहभागिता
इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय चिंतन-मंथन को सफल बनाने में दिन-रात मेहनत करने वाले नारायण कोल्हे धनगर, सेवानिवृत्त डीएसपी नजुंदप्पा, पोटा प्रसाद एवं आयोजक वेंकट नारायण बाबू सहित अनेक समाजसेवियों का विशेष योगदान रहा। दिल्ली से माता राम बेटी वृद्धाश्रम के कोषाध्यक्ष व देवी अहिल्याबाई सामूहिक विवाह सेवा ट्रस्ट रजि. दिल्ली के संस्थापक जे.डी. पाल, समाजसेवी तेजपाल सिंह चौखंडी, पाल एकता मंच की राष्ट्रीय अध्यक्ष व समाजसेवी भोजरानी पाल, समाजसेवी सोमवती पाल (धर्मपत्नी जे.डी. पाल), दीपक पाल, सुधा पाल, अर्जुन सिंह होल्कर, हरपाल सिंह धनगर, महेंद्र सिंह धनगर ने 12 सितम्बर को तिरुपति में जाकर इस प्रोग्राम में अपने-अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। बैठक में बाबू भाई देसाई (गुजरात), प्रशांत एड्सले (महाराष्ट्र), श्रीमती सुधा सिंह, रतन सिंह होलकर (मध्य प्रदेश), पवन थॉटए यवतवाल (महाराष्ट्र), रामाकांत कुरुबा (तमिलनाडु), रामचंद्र बंदीछोड़ (महाराष्ट्र), विनोद शिंदे सांगली, रोहित हेल्थ आॅफिसर, लक्ष्मण रेबारी (गुजरात), मारुति भावले (महाराष्ट्र) सहित विभिन्न राज्यों से आए अनेक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
बिखरे हुए कबीलों को एक राष्ट्रीय आवाज देने का संकल्प
परिषद के समापन अवसर पर प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया कि विभिन्न राज्यों और अलग-अलग नामों से पहचाने जाने वाले धनगर-गड़रिया-कुरुबा एवं अन्य चरवाहा कबीलों को सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से एकजुट कर उनकी सामूहिक आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया जाएगा। प्रतिनिधियों ने कहा कि यह दो दिवसीय बैठक केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आने वाले समय में देशभर के विमुक्त, घुमंतू एवं चरवाहा समाज के अधिकारों, सम्मान, प्रतिनिधित्व और विकास के लिए एक संगठित राष्ट्रीय अभियान का आधार बनेगी। -बरखा राम