समाज में शिक्षा की बहुत कदर है—कम से कम हम ऐसा सोचते तो हैं। आजकल लोगों का मानना है कि शिक्षा खुद चलकर उनके पास आए, दरवाजा खटखटाए और कहे—‘आओ मुझे अपनाओ।’ लेकिन लोग इतने व्यस्त हैं कि जवाब देंगे—‘अभी टाइम नहीं है, बाद में आना, हम बहुत जरूरी काम में लगे हैं!’ अब आप सोच रहे होंगे कि इतना जरूरी काम क्या है? तो जनाब, वो है ‘हाथ की दुनिया’—यानी मोबाइल। आज इंसान किताब से नहीं, स्क्रीन से ज्ञान लेता है, और वो भी ऐसा ज्ञान, जिसमें 5 मिनट में 50 वीडियो देख लिए जाते हैं, लेकिन 1 पेज नहीं पढ़ा जाता। पहले लोग एक-दूसरे के घर जाते थे, हाल-चाल पूछते थे, हँसी-मजाक होता था। अब सब कुछ मोबाइल में ही हो जाता है—नानाजी की तबियत कैसी है, ये भी व्हाट्सऐप स्टेटस से पता चल जाता है। इतना ही नहीं, लोग अपने ही रिश्तेदारों से मिलने के लिए 5 मिनट नहीं निकाल पाते, लेकिन फोन की बैटरी 5% होते ही चार्जर ढूंढने में जान लगा देते हैं। सच कहें तो इस ‘हाथ की दुनिया’ ने हमसे बहुत कुछ छीन लिया है—समय, रिश्ते और सबसे जरूरी-शिक्षा के प्रति लगाव। इसलिए अब समय आ गया है कि हम इस बनावटी दुनिया से थोड़ा बाहर निकलें, किताबों से दोस्ती करें और शिक्षा को सच में अपनाएं। क्योंकि यही शिक्षा है जो हमें असली सुख, शांति और समृद्धि देती है—बाकी मोबाइल तो बस हमें ‘आनलाइन’ रखता है, पर जिंदगी से ‘आफलाइन’ कर देता है।
-हरिओम सिंह बघेल
महेश्वरा, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
मो. 9977554274
व्यंग्य : हाथ की दुनिया-मोबाइल
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