स्वतंत्रता प्राप्ति के 80 वर्ष बाद भी भारत जो पहले विश्वगुरु कहलाता था, जहां से ज्ञान की गंगा बहती है, वेद-पुराण हैं, श्रीरामचरितमानस है, गीता का ज्ञान है, अनेक विद्वान हैं जो निरंतर कथा यज्ञ योग संपन्न करने और लोगों को ज्ञान की गंगा में अवगाहन कराते रहते हैं। फिर भी दुखद बात है कि आज भी भारत के सभी राज्यों में, सभी समाजों में, सभी वर्गों में सामाजिक कुरीतियां व्याप्त हैं जो आज तक समाप्त नहीं हो पाईं। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में जो अब विकसित राष्ट्र बनने का दावा कर रहे हैं, सामाजिक कुरीतियां समाप्त होने के बजाय और बढ़ रही हैं जबकि सभी समाजों में बड़े-बड़े राष्ट्रीय संगठन बने हुए हैं। गंभीरतापूर्वक हम अध्ययन करते हैं तो यह जानकारी प्राप्त होती है कि सरकारी तंत्र में जो लोग बैठे हुए हैं, वह नहीं चाहते कि ऐसी कोई कार्ययोजना बने जिससे राष्ट्र में हजारों वर्षों से चली आ रही सामाजिक कुरीतियां दूर हों। लोग विकसित सोच रखने वाले, दूरदृष्टि वाले और विवेकशील बनें। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों में ऐसी सभी सामाजिक कुरीतियों जो विकास में बाधक हैं, उनसे बाहर निकलने अथवा उसका समाधान ढूंढ लेने की क्षमता विकसित हो सके। आओ, जानते हैं ऐसी कौन-कौन सी सामाजिक कुरीतियां हैं जो समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं-
- अशिक्षा : स्वतंत्रता के 80 वर्ष बाद भी राष्ट्र में लोग पूरी तरह से शिक्षित नहीं हुए। कुछ राज्यों में तो पूर्ण साक्षरता ही नहीं है।
- नशे की प्रवृत्ति : यह इतनी बढ़ चुकी है कि प्रत्येक सुख-दुख के कार्य में लोग अधिकतर नशे का सेवन करके पहुंचते हैं। इससे हमारे समाज, परिवार व राष्ट्र का विकास अवरुद्ध होता है।
- सामंतवादी सोच : राष्ट्र में संवैधानिक व्यवस्था है। जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई है किंतु आज भी लोगों की सोच में सामंतवादी विचारधारा कायम है। इसलिए समाज के पदाधिकारी आज भी पारदर्शिता नहीं रखते और अपनी ही मनमानी से चलते हैं। इससे समाज का विकास नहीं हो पाता है।
- सामाजिक बहिष्कार : अपने ही समाज के लोगों का छोटी-छोटी बातों पर हुक्का-पानी बंद कर देना, उनका सामूहिक रूप से बहिष्कार कर देना आदि की अनेक घटनाएं राष्ट्र के अनेक राज्यों में बराबर हो रही हैं और इसके मामले न्यायालय में लंबित हैं। वर्तमान समय में किसी भी व्यक्ति को दंड देने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय को होता है। समाज सुझाव दे सकता है लेकिन दंड नहीं दे सकता। यह एक सामाजिक कुरीति है, इसके कारण भी समाज का विकास अवरुद्ध होता है।
- अंधविश्वास : टोना-टोटका जैसे विषय भी समाज के लिए घातक हैं। इसका प्रचलन न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी कायम है। पढ़े-लिखे विद्वान लोग भी ऐसे अनपढ़ भगत व तांत्रिकों के चक्कर में आ जाते हैं।
- मृत्युभोज : यदि किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके लिए शांति-पाठ, श्रद्धांजलि आवश्यक होती है। ऐसे समय में बाहर से आए हुए सामाजिक, पारिवारिक एवं अन्य समाज के भाई-बहनों के लिए केवल सामान्य भोजन की व्यवस्था पहले हुआ करती थी। अब मृत्युभोज के नाम पर अनेक प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। इससे जो समाज के गरीब व्यक्ति होते हैं उन पर विपरीत असर पड़ता है। सामाजिक परंपराओं को छोड़कर लोग आधुनिक परंपराओं के कारण समाज के विकास को स्वयं ही अवरुद्ध करते हैं।
- बलि प्रथा : देवी-देवताओं के नाम पर आज भी राष्ट्र के विभिन्न राज्यों में जानवरों के साथ ही बच्चों तक की भी बलि दी जाती है जिसके मामले न्यायालय में लंबित पड़े हुए हैं।
- मौखिक फरमान : समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा है कि समाज की पंचायत के लोग किसी भी प्रकार से लिखित में कोई काम नहीं करते, सभी मौखिक फरमान जारी करते हैं और जो उन्हें नहीं मानते उनके प्रति व्यक्तिगत दुर्भावना रखकर उन्हें प्रताड़ित करते हैं।
- आर्थिक दंड : समाज की पंचायत में लोगों को अपनी बात रखने की अनुमति भी नहीं दी जाती और उन्हें मोटी रकम का आर्थिक दंड सुना दिया जाता है। यह सबसे बड़ी सामाजिक कुरीति है।
- बेमेल विवाह : बाल विवाह अथवा बेमेल विवाह की प्रथा आज भी राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में बनी हुई है। कानून होने के उपरांत भी बाल विवाह अथवा बेमेल विवाह संपन्न होते हैं। इससे समाज का विकास अवरुद्ध होता है।
- संस्कार का प्रशिक्षण न देना : बच्चों को शिक्षा के लिए तो प्रोत्साहन मिलता है लेकिन संस्कारों का प्रशिक्षण समाज द्वारा नहीं दिया जाता। इसलिए बच्चे हाईस्कूल तक पहुंचते-पहुंचते माता-पिता और समाज के विरुद्ध ऐसे कदम उठा लेते हैं जिससे समाज के विकास पर प्रभाव पड़ता है।
विकसित समाज के नवनिर्माण, राष्ट्र के विकास एवं सामाजिक कुरीतियों को दूर करने हेतु समाज में लिखित में कार्ययोजना बनाई जाए और उस पर ईमानदारी के साथ काम किया जाए। सामाजिक कुरीतियों को दूर किए बिना समाज के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।
-नारायण प्रसाद पाली, साहित्यकार
मो. 9575761235