आज अपने देश में सभी लोग धर्म में राजनीतिक चर्चा करते ही रहते हैं चाहे घर हो या फिर बाहर। राजनीति दुनिया में सदैव धर्म से प्रभावित रही है इसीलिए प्राचीन काल से आज अर्वाचीन काल तक धर्म राजनीति करने की धुरी में रहा है। धर्म को साधने में राम को वन जाना पड़ा। आने वाला पर्व रामनवमी उन्हीं की याद में मनाया जा रहा है। वही राजा राम से वन गमन में भगवान राम बन गए। धर्म का प्रयोग वन से लेकर अयोध्या तक किया। धर्म न छोड़ने के कारण महामंत्री विदुर दासी पुत्र होकर के भी महाभारत करने की धुरी में बड़े किरदार रहे। कहा- ‘राजन धृतराष्ट्र, आप राजधर्म को नहीं समझ रहे हैं और हस्तिनापुर आपके धर्म न धारण करने की दशा में अपने पर रोएगा, इसलिए मैं राज दरबार छोड़ रहा हूं। जहां अपने महामंत्री की ही बात न मानी जाए, ऐसे गिरते पद की गरिमा पर मेरा रहना प्रश्नवाचक चिन्ह है?’ शायद भागवत गीता उपदेश के बाद विदुर नीति दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़ी गई है। वैसे भारतीय सनातन संस्कृति में शुक्राचार्य की नीति की चर्चा ना की जाए तो भारत की आचार्य परंपरा अधूरी मानी जाएगी, वह भी राजनीति की अजीब धुरी है जहां एक ओर ऐश्वर्य और दूसरी ओर असुरों के नायक गलत सही के निर्णायक प्रयोग हैं। धर्म धारण के ऐसे आचार्य जो संजीवनी विद्या से अपने को स्थापित किए हैं, वह तप के ऐसे पर्याय हैं कि संकल्प से सभी कार्य पूर्ण कर ले जाते हैं, मुर्दा को जिंदा भी कर सकते हैं। दरअसल धर्म हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध या अन्य भूमंडल में रह रहे लोगों के समूह के पास नहीं है, धर्म तो बहुत निजी जीवन प्रयोग है जिसको पा करके व्यक्ति अपने में मस्त रहता है, तभी तो हमारे देश में संत समाज को सही मायने में धर्म धारण करते देखा गया है और जिनके दो महासूत्र ‘कछु लेना ना देना मगन रहना, वैष्णव जन तो तेने कहिए पीर पराई जाने रे’ हैं। लोकतंत्र में भी इसीलिए धर्म का प्रयोग सदियों से होता आया है, चाहे भारत का एक समय का इस्लामीकरण हो या आज शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा माघ के स्नान का प्रयोग। इस प्रकार के प्रयोग सत्ता परिवर्तन के लिए होते ही हैं, चाहे समाजवादी पार्टी ने कारसेवकों पर गोली चलवाई हो या फिर भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कराया हो। लेकिन मेरी सोच से धर्म को जानने वाले को अहंकार से दूर रहना चाहिए। लेकिन धर्म जो बाहर दुनिया में लोग खोज रहे हैं वह नहीं है, अपितु वह आप अपने को बदल करके जनोपयोगी प्रयोग के साथ सद्गुणों को धारण करके ही दूसरों को समझाया जा सकता है। शायद वह सबको इतनी जल्दी सुलभ नहीं होता है, उसके लिए साधना में निरंतर लगना पड़ता है। इस प्रकार रामनवमी यही याद दिलाने के लिए प्रत्येक वर्ष मनाई जाती है। इसे सभी को समझना चाहिए।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822
धर्म की राजनीति में फंसा भारतीय समाज!
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