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धनगर समाज के संवैधानिक अधिकारों पर जागरूकता लेख

सत्य का प्रमाण केवल अभिलेखों में नहीं, सामाजिक वास्तविकता में भी निहित है
उत्तर प्रदेश में धनगर समाज आज जिस संवैधानिक संघर्ष से गुजर रहा है, उसका मूल कारण केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही भ्रमपूर्ण प्रविष्टियाँ, अधूरी जानकारी और वास्तविक सामाजिक स्थिति का पर्याप्त परीक्षण न होना है। अनेक परिवारों को अज्ञानतावश गड़ेरिया (ओबीसी) प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए, जबकि बाद में वही दस्तावेज उनके अधिकारों की राह में बाधा बनते दिखाई दिए। समाज को यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि गड़रिया समुदाय के भीतर परंपरागत रूप से धनगर और नीखर दो उपशाखाओं का उल्लेख मिलता है। सामाजिक व्यवहार, पशुपालन परंपरा, विवाह संबंध, पारिवारिक पहचान और स्थानीय बोली में दोनों के नाम प्रचलित रहे हैं, परंतु प्रशासनिक स्तर पर अनेक बार इनका परीक्षण बिना गहराई से किए एकसमान मान लिया गया। परिणामस्वरूप कई स्थानों पर नीखर (गड़ेरिया) को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अंतर्गत प्रमाणित किया गया, जबकि धनगर समाज अपनी विशिष्ट पहचान और संवैधानिक स्थिति के आधार पर अलग परीक्षण की मांग करता रहा है। यही वह बिंदु है जहाँ स्थलीय वास्तविकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। केवल नाम देखकर निर्णय कर देना पर्याप्त नहीं है; सामाजिक परंपरा, वैवाहिक संबंध, पारिवारिक पहचान, स्थानीय समुदाय की स्वीकृति और पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक स्थिति भी प्रशासनिक परीक्षण का हिस्सा होनी चाहिए। इसी कारण धनगर समाज यह मांग करता है कि जब भी जातीय सत्यापन या स्थलीय निरीक्षण किया जाए, तो वह वीडियोग्राफी सहित निष्पक्ष रूप से किया जाए, ताकि बाद में किसी प्रकार का तथ्यात्मक विवाद न रहे। वीडियोग्राफी से यह सुनिश्चित होगा कि निरीक्षण पारदर्शी हो, स्थानीय कथन सुरक्षित रहें और किसी प्रकार की प्रशासनिक या बाहरी प्रभाव से वास्तविकता प्रभावित न हो सके। धनगर समाज का यह आग्रह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई बार स्थलीय निरीक्षण के दौरान मौखिक तथ्यों को सही रूप में अभिलेखित नहीं किया जाता। यदि वीडियोग्राफी हो, तो सामाजिक परंपरा, स्थानीय पहचान, समुदाय के बुजुर्गों के कथन और वास्तविक स्थिति स्थायी साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रह सकती है। इस पूरे विषय का संवैधानिक आधार कंस्टीट्यूशन (शेड्यूल्ड कास्ट्स) आदेश, 1950 है, जिसके अंतर्गत अनुसूचित जातियों की सूची निर्धारित की गई और यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी परिवर्तन का अधिकार केवल संसद को है। इसका अर्थ यह है कि स्थानीय स्तर पर किसी जाति की स्थिति को मनमाने ढंग से बदला नहीं जा सकता। इसी क्रम में 24 जनवरी 2019 का उत्तर प्रदेश शासन स्पष्टीकरण आदेश भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें जाति प्रमाण पत्र निर्गत करते समय अभिलेखीय परीक्षण, नाम की स्पष्टता और वास्तविक स्थिति के सावधानीपूर्वक परीक्षण पर बल दिया गया है।
-गम्भीर धनगर, आगरा
मो. 9690470266

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