भारतीय सामाजिक जीवन शैली में बदलाव के लिए घर-परिवार में इतिहास गवाह है कि धीरे-धीरे बदलाव ही होते आ रहे हैं। भारत के दूसरे दार्शनिक राष्ट्रपति महामहिम स्वर्गीय सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने वैज्ञानिक ढंग से समाज के बदलाव की कल्पना की थी। यही एक कारण था कि वह कहते थे-जो काम मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा या अन्य धार्मिक क्रियाकलाप नहीं कर पाए; वह विज्ञान की क्रांति ने रेलगाड़ी का अविष्कार करके कर दिखाया, उसमें बैठकर भारतीयों ने अपने को बदला और एक उत्साहित जीवन, सहूलियतों से भरी जीवन शैली में स्थापित और विकसित होने के लिए गांव से शहरों की ओर पलायन किया। मेरा संकेत यह है कि टेक्नोलॉजी ने मानव जीवन की सभ्यता को बदला और विकास के नए-नए चरण या आयामों से गुजरते हुए वह यहां तक पहुंचा है। विकास की इस वैज्ञानिक दौड़ में उसने आज सब कुछ हासिल किया लेकिन पाने के साथ खोने का जिक्र स्वाभाविक है। क्या खोया, यह आज मानवता के सामने सबसे बड़ा सवाल है। उन्नति की अंधी दौड़ में उसने आपसी पड़ोसी प्रेमभाव, अपने ही परिवार का भाई-भाई का, भाई-बहन का, चाचा-चाची का, यहां तक कि नाते-रिश्तेदारों का भी प्यार खोया है। अब वह पैसे के लिए कटिया लगाकर मछली पकड़ने का काम कर रहा है, क्या यह विचारणीय नहीं है? इसी कशमकस में वह पुराने नीति शास्त्र को खो चुका है। उसे तकनीकी ढंग से हुनर से ऐब करके पैसा कमाना अब आ गया है। वह इसी टेक्नोलॉजी की चकाचौंध में पुराने सामाजिक मूल्यों के साथ नए मानक अपने ढंग से अपनी सोच को सही ठहरा करके सिर्फ अपने ही विकास के लक्ष्य को पाना चाह रहा है। अब राजशाही के बाद लोकशाही में उसे जो मौलिक विचार स्वतंत्रता के अधिकार मिले, वह हुनर से अपनी एकाकी उन्नति में लगा है। वह अपने मां-बाप को हाशिये पर करके सिर्फ और सिर्फ अपनों तक को धोखा देने में नहीं चूक रहा है। ऐसे में व्यक्ति ने जिस भारतीय वैज्ञानिक समाज का निर्माण किया है उसमें रोज हिंसा, बलात्कार, धोखाधड़ी, ठगी, एक-दूसरे के धन को हड़पने के लिए वह विचारों के झूठे खेल को खेलना सीख चुका है। सामाजिक संस्थाएं और कितने ही स्वयंसेवी संगठन उद्देश्य रोज कुछ बनाते हैं; और करने कुछ लगते हैं। वह समय के गतिमान प्रवाह में धोखेबाजी करते ज्यादा मिलते हैं। उसमें लोकतंत्र ने कर्ताभाव ज्यादा पैदा किया है। इंसान गुटबाजी ज्यादा सीखा है, इधर विचारों को अपने तरीके से रखने के लिए नए-नए प्रलोभनों से परहेज नहीं कर रहा है। इस बदलाव में आज भारत में सामाजिक आर्थिक उन्नति का हिसाब लगाने के लिए वर्तमान सरकार जनगणना कर रही है। अगड़े, पिछड़े और दलित इसे अपने हितों के लिए जरूरी मान रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में भागीदारी की बात चल पड़ी है और सरकार लैंगिक समानता के तहत अब सबको भागीदारी मिले इस पर बहस करना भी चाह रही है। सवाल यह है कि पिछड़े समाज में गडरिया पाल बघेल अपनी जनगणना क्या एक ही कालम ओबीसी में करवा पाएगा? मुझे संदेह है कि भारत भर में बिखरा गडरिया, पाल, बघेल समाज कहीं अनुसूचित जाति में एससी, कहीं अनुसूचित जनजाति में एसटी तक के प्रमाण पत्र बनवा चुका है। आज उसकी सबसे बड़ी जरूरत जातीय एकीकरण की है। क्या गडरिया समाज के नायक इस पर समय रहते ठोस कार्यनीति बना पाएंगे? वह कहां अपनी जनगणना कराएगा, ओबीसी गडरिया में या अन्य कहीं? यह सबसे बड़ा कठिन प्रश्न है, समाज के झूठे बने ठेकेदार इसे समझें।
-जगदीश प्रसाद पाल, उन्नाव
परास्नातक जनसंचार
मो. 9794866822
जातीय जनगणना में पाल बघेल गडरिया समाज कहां?
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