(मधुगीति 260605 A) 5:37
कहाँ मुक्त मन,
हो सका बंधनों से;
रहा लिप्त बिन बात,
वह हर किसी से!
न कोई है उसका,
न कोई किसी का;
है हर कोई उसका,
जनक जो है सबका!
अपेक्षाएँ करके,
उपेक्षाएँ सहके;
मुश्किल से समझ आते,
सीमित हैं जगती नाते!
अपेक्षित है सत्ता,
हिला हर ही पत्ता;
खिला फूल कोई,
खिलाया ज्यों वो ही!
है खुशबू किसी की,
कला हर किसी की;
जुड़ा ‘मधु’ ज्यों प्रभु से,
झूमा खुशी से!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
कहाँ मुक्त मन!
0
0
votes
Article Rating
Subscribe
Login
0 Comments
Oldest
Newest
Most Voted