किसी इंसान की हत्या उसके शरीर को समाप्त करती है, लेकिन उसके चरित्र की हत्या उसके जीते-जी उसे समाज की नजरों में मार देती है। सबसे दुखद बात यह है कि शरीर की हत्या के लिए हथियार चाहिए, लेकिन चरित्र की हत्या के लिए केवल कुछ झूठ, अफवाहें और सुनने को तैयार भीड़ ही काफी होती है। आज के समय में यह हत्या पहले से कहीं आसान हो गई है। एक झूठी बात, एक अधूरी कहानी, एक मनगढ़ंत आरोप और वर्षों से बनाई गई किसी की प्रतिष्ठा कुछ ही मिनटों में संदेह के कटघरे में खड़ी कर दी जाती है। विडंबना यह है कि लोग सच जानने से पहले फैसला सुना देते हैं। सबूत बाद में खोजे जाते हैं, निर्णय पहले दे दिया जाता है। कई बार अदालतें किसी निर्दोष को बरी कर देती हैं, लेकिन समाज की अदालत उसका नाम कभी बरी नहीं करती। क्योंकि घाव शरीर पर लगे हों तो भर सकते हैं, लेकिन चरित्र पर लगे दाग अक्सर लोगों की स्मृतियों में जिÞंदा रहते हैं। सबसे खतरनाक वे लोग नहीं हैं जो झूठ गढ़ते हैं, बल्कि वे हैं जो बिना सोचे-समझे उसे आगे बढ़ाते हैं। क्योंकि हर अफवाह का एक निर्माता होता है, लेकिन उसे ताकत देने वाले सैकड़ों दर्शक होते हैं। इसलिए किसी के बारे में कुछ सुनकर उसे सच मान लेने से पहले एक बार ठहरना चाहिए। क्योंकि हो सकता है कि आपके लिए वह केवल एक चर्चा हो, लेकिन किसी दूसरे के लिए वही उसकी वर्षों की कमाई हुई प्रतिष्ठा का जनाजा हो। आखिर में याद रखिए-तलवार का घाव शायद भर जाए, लेकिन चरित्र पर लगाया गया झूठा आरोप अक्सर पूरी जिंदगी साथ चलता है। किसी इंसान को मारना एक अपराध है, लेकिन किसी निर्दोष के चरित्र को मारना ऐसा अपराध है जिसकी सजा अक्सर कानून नहीं, समय देता है।
-गडरिया अशोक पाल, गाजियाबाद
संस्थापक स्वाभिमान शिक्षा संस्कृति समाजोत्थान न्यास
मो. 9717420311
चरित्र की हत्या किसी इंसान की हत्या से कम खतरनाक नहीं!
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