खुद को खुदा मत समझो,
एक मामूली इंसान हो तुम।
क्यों इतराते हो इतना
क्या खुदा का पैगाम हो तुम?
मौसम ए गर्मी में,
तो तपन होती ही है,
बारिश में मेघा गरजते ही हैं।
इतना हैरान क्यों हो तुम?
खुद को खुदा मत समझो
एक मामूली इंसान हो तुम।
बहार में हवा से
तो मौज उठती ही है।
उठकर गिरती ही है।
इतना गुमान मत कर ए मौज
दो पल की हस्ती तुम्हारी
तू मौज है, समुद्र थोड़े ही है।
खुद को खुदा मत समझो,
एक मामूली इंसान हो तुम
कसूर, खता, गलती तो,
इंसान से होती ही है।
कोई भगवान थोड़े हो तुम।
खुद को खुदा मत समझो,
एक मामूली इंसान हो तुम।
-नारायण प्रसाद पाली
प्रांतीय प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़
मो. 9575761235
मामूली इंसान हो तुम!
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