(मधुकथा 260612) 13:20
व्यक्ति स्वयं को समझने, सुलझने व और अधिक सम्यक, सार्थक, सुसंस्कृत, उत्कृष्ट, सशक्त, समर्थ व पूर्ण होने के लिए जीवन पाता है। वह सदा दृष्टा रहता है, दृश्य देखता है और अपनी आत्म-सत्ता में जा आवश्यक प्रबंधन निदेशन करता रहता है। उसके लिए वह और जगत् (य+गत् = जो सदा गत है) एक ही सत्ता है। उसके लिए वह और बाहरी जगत अलग नहीं, द्वैत नहीं। वह न स्वयं को महान समझता है और न जगत के किसी व्यवहार या व्यवस्था को विलग, गौण या विकृत। वहाँ सब उसी का है, उसी का प्रयोग है व उसी की विधि का विधान है। सब उसी की प्रक्रिया में हो रही एक क्रिया है, गुण-विधा है, अवस्था है, व्यवस्था है, और सब कुछ उसके नियंत्रण में है। प्रति पल, प्रति पग व प्रति पहल वह और प्रस्फुटित, प्रासंगिक, प्रायोजित, प्रायोगिक व प्रगतिशील होता चलता है। सामयिक, सर्वांगीण, सूक्ष्म व सर्वव्यापी प्रसार ही उसका गुण धर्म है। उसकी दृष्टि में कहीं कोई अटकाव, झुकाव या जड़ता नहीं होती। वह सर्वदा विवेकी व वैज्ञानिक दृष्टि लिए ज्ञान के असीम आयामों को अंत:करण में निहार स्मित भाव से भव में विचरता है। उसे अपनी सृष्टि की हर कृति की गूढ़ता, गरिमा, महत्ता, शक्ति व सामर्थ्य का ज्ञान रहता है और हर किसी को कैसे सँवारना, सँभालना और सुधारना है उसे आता है। वह अपनी किसी कृति या क्रियति की प्रकृति में कोई बुराई या अवगुण नहीं लखता। हर किसी के गुण निहार वह सिहरता है, आनन्द तरंगों में बह उन्हें आल्ह्वादित कर अपने अंग लगा उमंगों से भर देता है। हर कोई उसका सृष्ट है, जो जैसा है उसका अपना है। यदि कुछ अभी नहीं निखरा है तो उसे निखारना है। यदि कुछ दोष है तो भी उसी के प्रतिपालन, संचालन या प्रबंधन का है, तो वह उन्हें दोषी कैसे ठहराए। जगत् हमारा है, हम जगत के हैं। सब धाराएँ, धराएँ, धधक, धमक, धड़कनें, ध्वनियाँ, धर्म, ध्वजाएँ, धारणाएँ, धमनियाँ, नाद, नद, निनाद, स्नायु, चक्र, नाड़ी, सहस्रार, सृष्टा, संहारक, शासक, आलोचक, दार्शनिक व विवेकी हमारे अपने हैं, हम में हैं। जगत में यदि किसी को उसकी दृष्टि में कहीं कुछ सही नहीं लग रहा है तो उसकी अपनी दृष्टि का विकार हो सकता है। उसे स्वयं को और समझना-संवारना है। उसे स्वयं सतत प्रयोग कर, योग (जुड़) कर, गहन ध्यान कर अंतर्मन को समझ, ब्राह्मी मन बनाना है, और फिर पुन: पुनर्नवा दिव्य दृष्टि से स्वत: और जगत् की तहों को झाँकना है। हमारी दृष्टि में हम या हमारी जैसी दृष्टि के कुछ लोगों को हम महान या पूर्ण लग सकते हैं, पर यह सत्य हो ऐसा आवश्यक नहीं। हम यदि जीवित हैं, जागृत हैं, तो हर पल सीखेंगे; शिकायत नहीं करेंगे, आनन्द लेंगे, कार्य करेंगे, सेवा सुश्रुषा करेंगे। सृष्टि की हर सृष्ट आँख, हर परमाणु, हर त्राणी व हर तरंग हमें देख रही है। हर कोई हमारा मूल्यांकन कर हमें संचालित, संप्रेषित व संश्लेषित कर रहा है। सृष्टि का हर अवयव पूर्ण है, प्रतिष्ठित है, मर्यादित है, नियंत्रित है, नियंत्रक है, निर्णायक है, सतत स्वचालित और परस्पर पूरक है। हम अपनी, जगत की और उसकी हर सत्ता की महत्ता को जब समझ जाएँगे, तभी उसका आनन्द ले पाएँगे, तभी उसकी सेवा व सहयोग कर पाएँगे और तभी सृष्टि रचयिता की रचना का कुछ आस्वादन कर पाएँगे। बिना ऐसा किए हम जो भी सोचेंगे, कहेंगे, गुनगुनाएँगे, रचेंगे, या संचालन प्रबंधन करेंगे वह जगत को आनंदित नहीं करेगी। बिना आत्म बोध के जगत बोध नहीं होगा और बिना जगत के आत्म बोध भी नहीं होगा। इसलिए जगत में जहाँ हैं, वहाँ सूक्ष्म दृष्टि से देखें, बोध करें व अपनी व जगत की पूर्णता में प्रविष्ट हो स्वयं व समष्टि की अभिव्यक्ति का आनन्द लें।
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
जगत बोध!
🙏 💐 🦚