Harikamaldarpan

लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

आए, गए, ध्यान कुछ कह गए!

(मधुगीति 260615) 2:45
आए, गए, ध्यान कुछ कह गए,
लख गए, चख गए, वे बदल कुछ गए;
ले के कुछ वे गए, और दे कुछ गए,
कुछ हिला वे गए, और हिल कुछ गए!
और हम खिल गए, और कुछ खुल गए,
उनकी कोई कली तो, खिला हम गए;
भित्तियाँ वृत्तियों की शिथिल कुछ किए,
श्रंखलाओं को कुछ तो, खखोले गए!
कुछ फफोले रहे उनमें, जो दुख गए,
कुछ अहमिका की परतें थीं खिसका किईं;
आया उद्वेग कुछ, द्वैत जो हर गया,
झोंका आया कोई, जो था कुछ कर गया!
करके स्वाध्याय मन को, यथायथ किये,
बात करके किसी से, थे सीखा किए;
स्वयं सुलझा किए, और फिर लिख दिए,
बोध करके सुद्रढ़, धारणा ध्रुव किए!
पाया हम बहु किए, उनके दर्शन किए,
बदल काफी गए, उनको बदला किए;
छँट थे बादल गए, ‘मधु’ मृदुल हो गए,
हरि थे आए रहे, वेश उनके रहे!
-गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com

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