हे अयोध्या! तेरी प्राची में उठी घोर बेदर्दी की आग;
श्रीराम के चुराए स्वर्ण आभूषण, क्या नष्ट हुआ श्रद्धा का भाग?
मंदिर की मौन दीवारें चिल्लातीं हैं कहिए, कहाँ गया राम-राज्य गौरव-धर्म?
किसने छीना भरोसे का सोपान, किसने तोड़ा हिन्दुत्व का शांति-सर?
श्रीराम की मूरत रो रही, और भीतर प्रश्नों की घनी तबाही;
वो प्रश्न जो खरोंच रहे मनोभूमि पर, क्या सत्ता की चुप्पी है इसकी वाही?
जब सिंहासन पर बैठे शब्द रुकें हों, और नींद में सोई हों अदालतें,
वह मौन जो पनपे शून्य में, बन जाता है अपराधियों का ठिकाना, वह घातक राहतें।
यह केवल सोना नहीं, यह आस्था का अंग, पीढ़ियों का संवत्सर-त्राण है;
छिन गया जो, छीन लिया गया, समाज के नैतिक ढाँचे का मान है।
और वहीं सत्ता की शांत छवि, क्या वह ढके गीतों की ही मूर्ति बनी?
जब जनता पुकारे न्याय की, तब सरकार की मूकवृत्ति क्या निंदनीय नहीं?
आओ देशवासियों, केवल दीये जलाने से, नहीं होगा उद्धार;
हृदय में धर्म तभी पक्का होगा, जब उठेगा जन-आन्दोलित अधिकार।
न्याय की माँग करो, प्रश्न उठाओ, उन चुप्पियों को कर दो बेनकाब;
क्योंकि यदि चुप्पी मान्य हो जाए तो चोर भी बन जाता है सह-हाथी-खराब।
हमारे मंदिरों के चिराग लौटेंगे तभी, जब सत्य की रोशनी फैलेगी;
नैतिकता के स्तम्भ फिर खड़े होंगे, भ्रांतियों का जाल कटेगा।
सरकार को दुहाई है, बोलो, कार्य करो; दोषी को दिखाओ कानून की राह;
नहीं तो इतिहास कल तिरस्कार करेगा उस मूकता को, जो देती है दुराचार को खुलेआम आह।
ना केवल आंसू, ना केवल क्रोध, बल्कि नीति, न्याय और जवाबदेही चाहिए;
हिंद का गौरव तब लौटेगा जब दण्ड होगा सख्त, न्याय की परिधि सजीव होगी।
आओ! हाथ जोड़कर नहीं, कदम बढ़ाकर, करें प्रतिज्ञा हम सब मिलकर :
कि न केवल आभूषण, अपितु लौटेगा विश्वास, लौटेगी मर्यादा, पुन: देश का पवित्र स्वर।
-इंजी. डी.पी. सिंह बघेल, दिल्ली
मो. 9971232277
हे अयोध्या!
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