पता नहीं किसने कहा था कि ‘पूत कपूत हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं हो सकती।’ अखबार उलटते-पलटते उसके मस्तिष्क में यह बात तब आई जब उसने एक ताजी घटना पढ़ी कि कैसे एक मां ने अपनी बेटी को चंद धन के लिए बेच दिया। यह तो आजकल की आम बात है। यह सोचकर वह फिर से अखबार उलटने-पलटने लगा, तभी उसके मस्तिष्क में एक पुरानी घटना ताजा हो गई। कैसे उसकी स्वयं की मां ने पुस्तैनी जायदाद से उसे वंचित कर दिया। बल्कि उसने बड़े बेटे होने का पूरा-पूरा फर्ज निभाया। जब उसके स्वयं के भाई दुधमुंहे थे तब बाप के साथ मिलकर मेहनत-मजदूरी करके घर की माली हालत सुधारी और स्वयं के भविष्य की चिंता न करके अपनी मां व छोटे भाइयों पर ध्यान दिया। जब छोटे भाई जवान हुए तो उसी मां ने उन्हें भड़काया और सबने मिलकर उसे पीट-पाटकर अलग कर दिया। सारी संपत्ति पर अपना अधिकार जमा लिया। उसका स्वयं का बाप मूकदर्शक बना रहा। कुल मिलाकर मौन स्वीकृति। संसार के झूंठे रिश्तों के बारे में सोचकर उसका हृदय सिहर उठा…।
-मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
गांव-रिहावली, डाक-तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा-283111
मो. 9627912535
कुमाता
0
0
votes
Article Rating
Subscribe
Login
0 Comments
Oldest
Newest
Most Voted