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लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

संगठन नहीं, समाज सर्वोपरि होता है…!

किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति उसके संगठनों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके उद्देश्य, अनुशासन, कार्यशैली और समाज के प्रति समर्पण से आँकी जाती है…मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब वही मतभेद व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप, सोशल मीडिया की बहस और आपसी कटुता में बदल जाएँ, तो सबसे अधिक नुकसान पूरे समाज की छवि को होता है…आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि कौन किस पद पर है। या किस संगठन से जुड़ा है…आवश्यकता इस बात की है कि कौन समाज के लिए ईमानदारी से कार्य कर रहा है…पद सम्मान का माध्यम हो सकता है, लेकिन सेवा का विकल्प कभी नहीं हो सकता…जो व्यक्ति बिना पद के समाज के लिए काम करता है, उसका योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी बड़े पदाधिकारी का। हर संगठन की अपनी कार्यशैली, नियम और विचारधारा होती है…यदि किसी को किसी संगठन से वैचारिक असहमति है, तो उसे मर्यादा के साथ अपनी बात रखनी चाहिए…नए संगठन बनाना या किसी दूसरे संगठन से जुड़ना किसी का अधिकार है, लेकिन इसका उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। सोशल मीडिया आज विचार व्यक्त करने का प्रभावशाली माध्यम है, पर इसे व्यक्तिगत संघर्ष का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए। हमारी हर पोस्ट, हर टिप्पणी और हर प्रतिक्रिया आने वाली पीढ़ी के सामने हमारे समाज की तस्वीर प्रस्तुत करती है। यदि हम स्वयं एक-दूसरे का सम्मान नहीं करेंगे, तो बाहरी समाज भी हमारा सम्मान कैसे करेगा? समाज की उन्नति फेसबुक की पोस्टों, पदों की घोषणाओं या तस्वीरों से नहीं होगी, वह होगी शिक्षा, संगठन, युवाओं के मार्गदर्शन, महिलाओं के सशक्तिकरण, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता से। यदि हमारी ऊर्जा इन कार्यों में लगेगी तो आने वाला समय निश्चित रूप से समाज के लिए गौरवशाली होगा। आइए, हम यह संकल्प लें कि आलोचना करेंगे तो समाधान के साथ करेंगे, असहमति होगी तो मर्यादा के साथ होगी और संगठन चाहे कोई भी हो, लक्ष्य केवल एक रहेगा ‘समाज का सम्मान, समाज की प्रगति और समाज की एकता’…क्योंकि अंतत: इतिहास उन लोगों को याद नहीं रखता जिन्होंने सबसे अधिक विवाद किए, बल्कि उन्हें याद रखता है जिन्होंने सबसे अधिक निर्माण किया।
-रामकृष्ण बघेल, ग्वालियर
मो. 7879705286

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