किसी भी जीवंत लोकतंत्र की आत्मा उसके जन-प्रतिनिधियों की नैतिक जवाबदेही और वैचारिक निष्ठा में बसती है। लेकिन जब राजनीति में सिद्धांतों का स्थान अवसरवाद ले लेता है—जहाँ जनप्रतिनिधियों के लिए दल बदलना और रातों-रात निष्ठाएं बदलना एक सामान्य प्रक्रिया बन जाती है; तो लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन होने लगता है। राजनीति का यह पाला-बदल न केवल मतदाताओं के विश्वास को गहरी ठेस पहुँचाता है, बल्कि राष्ट्र को एक ऐसे मार्ग पर ले जाता है जहाँ से शासन व्यवस्था में ईमानदारी कोसों दूर नजर आने लगती है।
अवसरवाद का संकट और संवैधानिक चिंताएं :
आम नागरिक किसी भी जनप्रतिनिधि को उसकी पार्टी की विचारधारा, चुनावी घोषणापत्र और उसके वादों पर भरोसा करके चुनता है; लेकिन जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं या तात्कालिक राजनीतिक लाभ हावी हो जाते हैं, तो यह भरोसा अक्सर टूटता नजर आता है। भारत में इस राजनीतिक पाला-बदल को रोकने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची में (दलबदल विरोधी कानून) बनाया गया था। परंतु, समय के साथ इस कानून की तकनीकी कमियों का लाभ उठाकर व्यवस्था में नए रास्ते तलाश लिए गए हैं। सामूहिक इस्तीफे, कानूनी व्याख्याओं का खेल और प्रक्रियात्मक कमियों के कारण यह कानून अपने मूल उद्देश्य को पूर्णत: प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है। जब देश की व्यवस्थाएं स्थायी नीतियों के बजाय राजनीतिक जोड़-तोड़ के समीकरणों से प्रभावित होने लगती हैं, तो दीर्घकालिक राष्ट्र-निर्माण की गति धीमी पड़ जाती है। यह किसी एक दल की समस्या नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक संस्कृति का एक ऐसा कैंसर है जो समय-समय पर हर स्तर पर दिखाई देता है।
सकारात्मक राजनीतिक सुधार :
कुछ अंतरराष्ट्रीय उदाहरण-वैचारिक अस्थिरता और राजनीतिक पतन की इस वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए दुनिया के कई देशों ने अनुकरणीय विधायी और संस्थागत सुधार किए हैं, जिनसे सीख अवश्य ली जा सकती है :
राइट टू रिकॉल’-स्विट्जरलैंड और कनाडा :
कई विकसित लोकतांत्रिक देशों में यदि कोई जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदलता है या जनता की आकांक्षाओं के विपरीत काम करता है, तो मतदाताओं के पास उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उसे वापस बुलाने का अधिकार होता है। यह व्यवस्था नेताओं को अपनी विचारधारा और जनता के प्रति वफादार रहने के लिए मजबूर करती है।
सख्त दलबदल कानून और तत्काल अयोग्यता-बांग्लादेश और केन्या :
बांग्लादेश के संविधान के अनुच्छेद 70 के तहत, यदि कोई सांसद अपनी पार्टी के खिलाफ वोट करता है या पार्टी से इस्तीफा देता है, तो उसकी संसद सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाती है। इसी तरह, केन्या के कानून जनप्रतिनिधियों को व्यक्तिगत लाभ के लिए जनादेश का सौदा करने की अनुमति नहीं देते।
गठबंधन सरकारों के लिए कानूनी ढांचा-जर्मनी :
जर्मनी में ‘कोआलिशन एग्रीमेंट’ को एक कानूनी और औपचारिक दस्तावेज माना जाता है। चुनाव के बाद पार्टियां लिखित समझौते के आधार पर सरकार चलाती हैं, जिससे रातों-रात सरकारें गिराने या पाला बदलने की अनैतिक राजनीती पर नियंत्रण रहता है।
संसदीय संप्रभुता और आचार संहिता-यूनाइटेड किंगडम :
ब्रिटेन में ‘नो-कॉन्फिडेंस’ (अविश्वास प्रस्ताव) और संसदीय आचार संहिता इतनी सख्त है कि नैतिक आधार पर नेताओं को खुद ही पद छोड़ना पड़ता है, जिससे जोड़-तोड़ की गुंजाइश पूर्णत: समाप्त हो जाती है।
कृत्रिम विकास का छलावा :
इसी नीतिगत अस्थिरता और वैचारिक शून्यता के बीच जब केवल ‘कृत्रिम विकास’ को ही प्रगति का एकमात्र पैमाना माना जाता है, तो समाज में एक भ्रमजाल की स्थिति पैदा होती है। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े आंकड़े, चमचमाती कंक्रीट की संरचनाएं और विशाल बुनियादी ढांचे निश्चित रूप से किसी भी राष्ट्र के लिए गर्व का विषय अवश्य हैं, लेकिन यह विकास तब तक ‘कृत्रिम’ और अधूरा माना जाएगा, जब तक देश की बुनियादी व्यवस्थाएं—जैसे हर नागरिक के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, न्यायसंगत रोजगार, संवैधानिक न्याय, वस्तुओं की मजबूत गुणवत्ता, इथेनॉल रहित पेट्रोल, खाने-पीने की वस्तुओं की शुद्धता और प्रत्येक स्तर पर सामाजिक सुरक्षा मजबूत न हों। यदि विकास की चमक-धमक केवल सतह पर दिखती है और समाज का अंतिम व्यक्ति इस भूमंडलीकरण के दौर में अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्षरत हो, तो ऐसी प्रगति को किसी भी रूप में स्थायी नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक अस्थिरता के कारण जब नीतियां केवल अगले चुनाव को ध्यान में रखकर बनाई जाती हों, तो दूरगामी और कल्याणकारी योजनाएं अक्सर पीछे छूट जाती हैं। यहां हमें भूटान के ‘ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस’ जैसे वैश्विक उदाहरणों से सीखना चाहिए, जो केवल आर्थिक आंकड़ों के बजाय नागरिकों की मानसिक, सामाजिक और नैतिक खुशहाली को वास्तविक विकास मानता है।
सुधारात्मक मार्ग और निष्कर्ष :
इस वैचारिक संकट से उबरने के लिए व्यवस्थागत और सामाजिक दोनों स्तरों पर कड़े सुधारों की घोर आवश्यकता है :
संवैधानिक और विधायी सुधार :
अंतरराष्ट्रीय तर्ज पर दलबदल विरोधी कानून को और अधिक स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा। पाला बदलने वाले जनप्रतिनिधियों पर न केवल तत्काल अयोग्यता कानून लागू हो, बल्कि उनके दोबारा चुनाव लड़ने पर भी निश्चित समय के लिए प्रतिबंध हो।
नागरिकों की भूमिका :
मतदाताओं को तात्कालिक लोक-लुभावन वादों से ऊपर उठकर जनप्रतिनिधियों से उनकी वैचारिक स्थिरता और नीतिगत कार्यों का हिसाब मांगना होगा। जब तक राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता और जनता के प्रति वास्तविक जवाबदेही की पुनर्स्थापना नहीं होगी, तब तक विकास की कोई भी बड़ी इमारत खोखली ही प्रतीत होगी। राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल ढांचागत चमक-धमक से नहीं, बल्कि नैतिक राजनीति और मानव-केंद्रित विकास के संतुलन से ही संभव है।
-नरेश कुमार पाल, मेरठ
मो. 9997326200
लोकतंत्र, दल-बदल और कृत्रिम विकास : नीतिगत पतन की पराकाष्ठा!
1
1
vote
Article Rating
Subscribe
Login
0 Comments
Oldest
Newest
Most Voted