यहाँ हर जाति का आदमी किसी न किसी राजवंश से अपना रिश्ता जोड़ लेता है। किसी को फलानावंशी होने का गर्व है, किसी को ढिकानावंशी होने का, कोई किसी महान सम्राट का वंशज बताता है, तो कोई किसी योद्धा का। इसके लिए ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती। इस देश का साहित्य, धार्मिक ग्रंथ, लोककथाएँ और इतिहास इतने राजाओं, रियासतों और वीरगाथाओं से भरा पड़ा है कि हर कोई अपने लिए कोई न कोई गौरवशाली पूर्वज चुन ही लेता है। असल में यह एक मानसिक भूख भी है। जो समाज सदियों तक हार, गुलामी, अपमान और पराधीनता का बोझ ढोता है, वह अक्सर अपने वर्तमान की कमजोरी को अतीत की वीरता से ढकने की कोशिश करता है। वह अपने पूर्वजों को राजा घोषित करके स्वयं भी कुछ पल के लिए राजा होने का सुख महसूस करना चाहता है। यह गौरव नहीं, कई बार हीनभावना पर चढ़ाया गया स्वर्णिम आवरण होता है। जरा दूसरी तरफ भी देखिए। अंग्रेजों ने ऐसा साम्राज्य खड़ा किया था जिसके बारे में कहा जाता था कि ‘ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता।’ भारत में रात होती थी तो उनके किसी दूसरे उपनिवेश में दिन निकल रहा होता था। दुनिया के विशाल हिस्से पर उनका शासन था। भारत के राजा, रजवाड़े और जागीरदार भी अंतत: उसी साम्राज्य के अधीन थे। इतिहास का यह तथ्य उनसे कोई छीन नहीं सकता। लेकिन क्या आपने कभी देखा कि आज का सामान्य ब्रिटिश नागरिक सोशल मीडिया पर रोज यह लिखता घूमता हो कि ‘हम दुनिया की आधी जमीन के मालिक थे’? क्या वह हर दूसरे दिन अपने साम्राज्य का ढोल पीटता है? ज्यादातर नहीं। बल्कि ब्रिटेन में उपनिवेशवाद पर गंभीर बहस होती है। बहुत से लोग अपने ही साम्राज्य की आलोचना करते हैं। वे लूट, दासता, शोषण और उपनिवेशवाद को इतिहास का काला अध्याय मानते हैं। उन्हें अपने वर्तमान का आत्मविश्वास साबित करने के लिए हर समय साम्राज्य का प्रमाणपत्र दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती। और इधर हम…एक पल में राजवंशी, दूसरे पल में शोषित, तीसरे पल में जाति के योद्धा, चौथे पल में राजनीतिक भक्त, पाँचवें पल में सोशल मीडिया पर गालियों की बौछार। यहाँ जातियों की अपनी-अपनी डिजिटल गैंग हैं। हर गैंग अपने नायक गढ़ती है, अपने इतिहास लिखती है और दूसरे की कहानी मिटाने में जुट जाती है। मानो इतिहास नहीं, ट्रेंडिंग हैशटैग की लड़ाई चल रही हो। विडंबना यह है कि हम वर्तमान बनाने से ज्यादा अतीत के सिंहासन पर बैठने की कोशिश करते हैं।
-रामकृष्ण बघेल, ग्वालियर
मो. 7879705286
वर्तमान बनाने से ज्यादा अतीत के सिंहासन पर बैठने की कोशिश क्यों?
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