न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
मुख-मंडल दमके लेकिन,
है कौन सुजान भरोसे का?
धन से बड़ा लगाव का नाता
स्वार्थ के वश में भाव दिखाता
सृष्टि पर कृतघ्न रहे,
क्या ये विद्वान भरोसे का!
न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
मूरत, मठ-मंदिर को सजाता
कामी हिय का, लोभ से नाता
हरियाली का हरण करे,
कहे कपि हनुमान भरोसे का!
न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
भू, जल, अग्नि, पवन, गगन,
पर्वत, सागर, पर्यावरण
इन्हें प्रदूषित कर कहता,
मेरा भगवान भरोसे का!
न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
निस दिन हिंसा, व्यभिचार हों
अतिक्रमण हों, अनाचार हों
जहाँ मर्यादा लज्जित-खंडित,
क्यों हो श्रीराम भरोसे का!
न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
छल, वासनाओं का रोपण हो
जहाँ नारी देह का शोषण हो
स्त्री दुखी, वहाँ क्यों होगा,
अंबा गुणगान भरोसे का?
न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
जिनके हाथ में देश को सौंपा,
भ्रष्टाचार, निरंकुश सुरसा
कई बजरंगी गटक गई,
कहें देश का मान भरोसे का!
न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
रिश्वत दफ्तर से मंत्रालय,
खाएँ चढ़ावा हर देवालय
मुफ्त का बड़ा चटोरा मुँह,
किसका स्वाभिमान भरोसे का?
न इंसान भरोसे का, न ईमान भरोसे का!
-जोहन पाल, सेंदरी, बिलासपुर
मो. 7974025985
न इंसान भरोसे का!
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