आज के दौर में ‘राजनीतिक शुचिता’ सिर्फ किताबों और भाषणों तक सीमित होकर रह गई है। राजनीति का स्तर इस कदर गिर चुका है कि सुबह दिया गया बयान शाम तक बदल जाता है। सिद्धांतों और विचारधाराओं की जगह केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ ने ले ली है। यह न केवल न्यायप्रिय सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद को भी कमजोर करता है।
सामाजिक आयोजनों का राजनीतिकरण : अक्सर देखा जाता है कि समाज के किसी विशेष या सांस्कृतिक आयोजन में जब लोग भारी संख्या में एकत्र होते हैं, तो कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पूरे समाज की वृहद स्तर पर आलोचना या ध्रुवीकरण शुरू कर देते हैं। किसी एक मंच से पूरे समाज को कठघरे में खड़ा करना पूरी तरह अनुचित है। सामाजिक मंच भाईचारे और सामंजस्य के लिए होते हैं, न कि राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए। राजनीतिक रूप से दिशाहीनता किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे देश के समाज की एक साझा समस्या बन चुकी है। नियम, कायदे और संवैधानिक सिद्धांतों का हवाला, सुबह कुछ और शाम को कुछ और बोलना तथा सामाजिक मंचों का बेजा इस्तेमाल करना हमारे देश के कई स्थापित नियमों और सिद्धांतों का उल्लंघन है।
न्यायप्रियता का सिद्धांत : न्याय का बुनियादी नियम कहता है कि बिना किसी ठोस आधार या बिना निष्पक्ष जांच के, किसी पूरे समूह या समाज को दोषी या आलोच्य नहीं ठहराया जा सकता। सामूहिक दोषारोपण का सिद्धांत पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
संसदीय और लोकतांत्रिक मर्यादा : भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसकी भी तार्किक सीमाएं हैं। कोई भी भाषण सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने वाला या किसी समाज को अपमानित करने वाला नहीं होना चाहिए।
अहंकार, अज्ञानता और सामाजिक मर्यादा का हनन : आजकल कुछ तथाकथित ‘छोटे-बड़े’ नेताओं में गजब का अहंकार देखने को मिल रहा है। चंद राजनेताओं के बीच खुद को ‘सर्वज्ञानी’ साबित करने की होड़ में वे किसी भी सामाजिक मंच पर खड़े होकर एक पूरी विशेष समाज को ही गलत ठहराने का दुस्साहस कर बैठते हैं। यह किसी नेतृत्व की पहचान नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का निजी अहंकार और मानसिक खोखलापन है। इसे पहचानना जरूरी है।
खुद को सर्वज्ञानी समझना : कुछ लोगों को लगता है कि मुट्ठीभर राजनीतिक रसूखदारों के बीच बैठ जाने से वे समाज से ऊपर हो गए हैं। यह उनका भ्रम है।
सामूहिक अपमान : किसी व्यक्ति या व्यवस्था से नाराजगी हो सकती है, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा के लिए पूरी कम्युनिटी को कटघरे में खड़ा करना सामाजिक नियमों और मर्यादा का घोर उल्लंघन है।
अहंकार का प्रदर्शन : जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से पूरे समाज की आलोचना करता है, तो वह समाज को छोटा और खुद को बड़ा दिखाने का प्रयास कर रहा होता है। यह सीधे तौर पर उसका व्यक्तिगत अहंकार है। सामाजिक ताने-बाने का पहला नियम है—पारस्परिक सम्मान। कोई भी पद या राजनीतिक रसूख किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं देता कि वह किसी समाज की सामूहिक प्रतिष्ठा पर चोट करे। भारतीय समाज और कानून भी ऐसी विभाजनकारी और अपमानजनक भाषा की अनुमति नहीं देता जो सामाजिक सौहार्द को बिगाड़े।
अंतिम संदेश : नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि समाज से राजनीति बनती है, राजनीति से समाज नहीं। किसी कम्युनिटी को गलत कहकर आप खुद को बुद्धिमान साबित नहीं कर रहे, बल्कि अपना अहंकार उजागर कर रहे हैं। समाज ऐसे अहंकारी और स्वघोषित ‘सर्वज्ञानियों’ को बहुत अच्छी तरह पहचानता है और समय आने पर उनकी सही जगह भी दिखा देता है। मंच का सम्मान करना सीखिए, समाज का अपमान करना बंद कीजिए।
-नरेश कुमार पाल
मो 9997326200
समाज का अपमान करना बंद कीजिए!
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