जब भी किसी सामाजिक उत्थान के कार्य के लिए लोगों से सहयोग का आग्रह किया जाता है, तब कुछ लोग चुपचाप किनारा कर लेते हैं, तो कुछ का सीधा-सा जवाब होता है—‘समाज हमें क्या दे रहा है? हम क्यों समाज की चिंता करें?’ ऐसी सोच केवल निराशाजनक ही नहीं, बल्कि समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारियों से विमुख होने का संकेत भी है। ऐसे लोगों की दुनिया अक्सर अपने परिवार तक ही सीमित रह जाती है। आसपास क्या हो रहा है, समाज किन चुनौतियों से जूझ रहा है, या उसके विकास में उनका क्या योगदान हो सकता है—इन बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे लोगों से बस इतना कहना है कि हमसे समाज नहीं है, बल्कि समाज से हम हैं। यदि कोई पूछता है कि ‘समाज हमें क्या देता है?’, तो इसका उत्तर बहुत सरल है। समाज ही बेटी के लिए दामाद और बेटे के लिए बहू देता है। समाज ही हमें मित्र देता है, जीवन साथी देता है, मौसी-मौसा, मामा-मामी, फूफा, चाची, ताई, जीजा-साली, नाना-नानी, सास-ससुर, भाभी, ननद, नंदोई—न जाने कितने रिश्ते हमें समाज से ही मिलते हैं। हमारी पहचान, हमारी प्रतिष्ठा, हमारा सहयोग-तंत्र और हमारे सुख-दुख के साथी—सब समाज की ही देन हैं। सच्चाई यह है कि एक अकेला व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता। उसका अस्तित्व समाज से जुड़कर ही सार्थक बनता है। मनुष्य केवल पारिवारिक प्राणी नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्राणी भी है। जिस प्रकार हम अपने परिवार की जिम्मेदारियों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समय-समय पर अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों का भी पालन करना चाहिए। एक सुदृढ़, शिक्षित, जागरूक और सहयोगी समाज ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित, संस्कारित और प्रगतिशील भविष्य दे सकता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि ‘समाज हमें क्या देता है?’, बल्कि यह होना चाहिए कि ‘हम समाज को क्या दे रहे हैं?’ क्योंकि समाज का उत्थान ही अंतत: हम सभी का उत्थान है।
-रणपाल सिंह, मेरठ
मो. 8881119008
सामाजिक उत्तरदायित्वों का भी पालन करना चाहिए!
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