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क्या केवल राम मंदिर का चंदा ही मुद्दा है?

हाल के दिनों में मंदिरों के चंदे और उसके उपयोग को लेकर अनेक प्रकार की चर्चाएं और आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं। ऐसे में मेरा एक सीधा और निष्पक्ष प्रश्न है। यदि किसी मंदिर के चंदे में अनियमितता या चोरी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन क्या हमारी चिंता केवल एक ही मंदिर तक सीमित होनी चाहिए? देश में अनेक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं—राम मंदिर, वैष्णो देवी, केदारनाथ, बद्रीनाथ, महाकाल तथा अन्य ऐतिहासिक मंदिर, जिनमें से कई का निर्माण या पुनर्निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। इन सभी मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा बड़ी मात्रा में चढ़ावा और दान दिया जाता है। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इन मंदिरों के चंदे का प्रबंधन कैसे होता है, उसका उपयोग कहाँ किया जाता है और उसकी पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाती है। यदि हमारा उद्देश्य वास्तव में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को समाप्त करना है, तो हमें किसी एक मंदिर या संस्था तक सीमित न रहकर सभी धार्मिक संस्थानों के वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता की मांग करनी चाहिए। किसी भी प्रकार की चोरी या गड़बड़ी, चाहे वह किसी भी मंदिर, संस्था या संगठन में हो, उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। जनहित में आवश्यक है कि सभी धार्मिक संस्थानों के चंदे के संग्रह, उपयोग और लेखा-जोखा की व्यवस्था पारदर्शी हो। इससे श्रद्धालुओं का विश्वास भी मजबूत होगा और सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही भी बढ़ेगी। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन प्रश्न निष्पक्ष हों और सभी के लिए समान मानदंड अपनाए जाएँ। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद और सामाजिक विश्वास की पहचान है।
-उदय पाल, दिल्ली
मो. 9821189131

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