(मधुगीति 260802 B) 4:53
पाये समझ थे कितने उन्हें,
समझे वे जिन्हें;
जीवन-प्रयोग झाँकियों में,
विचरत भव में!
हर पल प्रवासी श्वांस रही,
आश बहु रहीं;
विश्वास कितने आए गए,
बहावों बहे!
बन विहग कभी जीव चला,
ब्रह्म सरोवर;
झाँके रहे थे आत्म धरे,
कितने कलेवर!
हर झाँका ताका औ तराशा,
अपने तरीके;
खुद बदल गया विनिमय बिच,
लखे झरोखे!
किरदार किरायेदार हर ही,
विश्व भुवन में,
‘मधु’ देखे उन्हें जैसे ‘उन्हें’
आत्म लोक में!
-डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओंटारियो, कनाडा
www.GopalBaghelMadhu.com
पाये समझ थे कितने उन्हें!
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