‘चुनाव आते-जाते रहेंगे, लेकिन समाज की एकता और सम्मान हमेशा सर्वोपरि रहना चाहिए।’ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे निकट आ रहे हैं, वैसे-वैसे पूरे प्रदेश का राजनीतिक वातावरण गर्म होता जा रहा है। इसका प्रभाव हमारे भेड़पालक (गड़ेरिया/पाल) समाज पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। राजनीतिक दलों की गतिविधियाँ तेज हो गई हैं, वहीं सामाजिक संगठनों की सक्रियता भी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। आज हर मंच पर, हर बैठक में और हर चौपाल पर एक ही चर्चा है—‘ऊँट किस करवट बैठेगा?’ लेकिन विडंबना यह है कि चर्चा तो बहुत हो रही है, परंतु समाज के भविष्य का कोई स्पष्ट और ठोस रोडमैप सामने नहीं आ रहा। दुर्भाग्य से कुछ सामाजिक संगठन अपने अस्तित्व और प्रभाव को एक-दूसरे से बड़ा साबित करने की होड़ में लगे हुए हैं। दूसरी ओर, लगभग हर राजनीतिक दल यह संदेश देने का प्रयास कर रहा है कि वही हमारे समाज का सबसे बड़ा हितैषी है। कहीं नए राजनीतिक विकल्पों की घोषणा की जा रही है, तो कहीं पुराने दल अपने नेताओं के माध्यम से यह विश्वास दिलाने में लगे हैं कि समाज का पूरा समर्थन उनके साथ है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी अनुत्तरित है—क्या किसी ने समाज को यह भरोसा दिलाया है कि चुनाव के बाद भी उसकी आवाज सुनी जाएगी? क्या किसी ने यह स्पष्ट किया है कि समाज के युवाओं को शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक सम्मान के लिए कौन-सी ठोस नीति अपनाई जाएगी? हमारा समाज मेहनतकश, ईमानदार और स्वाभिमानी समाज है। सदियों से इस समाज ने अपने श्रम और संस्कारों के बल पर अपनी पहचान बनाई है। इसलिए केवल चुनावी वादों, बड़ी-बड़ी सभाओं या आकर्षक नारों से यह समाज अब संतुष्ट नहीं होगा। आज आवश्यकता है विश्वास, पारदर्शिता और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की। समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि कहीं हम व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, गुटबाजी और राजनीतिक आकर्षण में अपनी सामूहिक शक्ति को कमजोर तो नहीं कर रहे। यदि हम संगठित रहेंगे तो हमारी राजनीतिक भागीदारी भी मजबूत होगी और हमारी सामाजिक आवाज भी प्रभावशाली बनेगी। आज समय की मांग है कि सामाजिक संगठन आपसी प्रतिस्पर्धा छोड़कर समाजहित में एक साझा मंच तैयार करें और राजनीतिक दल केवल वोट नहीं, बल्कि समाज के विकास का स्पष्ट विजन प्रस्तुत करें। अंतत: निर्णय समाज के हाथ में है। समाज भावनाओं से नहीं, बल्कि नीति, नीयत और भविष्य की गारंटी को देखकर अपना निर्णय करेगा। आइए, चुनावी शोर से ऊपर उठकर सामाजिक एकता, शिक्षा, संगठन और सम्मान को अपनी प्राथमिकता बनाएं। अब देखना यह है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, राजनीतिक समीकरण किस दिशा में बदलेंगे और वास्तव में ‘ऊँट किस करवट बैठेगा?’
-महेंद्र पाल
राष्ट्रीय संयोजक शेफर्ड फैमिली ट्रस्ट, पूर्व
अध्यक्ष गड़ेरिया धनगर समन्वय समिति मुंबई
मो. 8291000903
चुनावी माहौल में सामाजिक एकता की सबसे बड़ी परीक्षा!
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