डिजिटल क्रांति ने हमारे जीवन को अभूतपूर्व गति दी है। ज्ञान, शिक्षा, मनोरंजन और संवाद के अनगिनत अवसर आज हमारी हथेली में मौजूद हैं। लेकिन हर तकनीकी क्रांति अपने साथ कुछ चुनौतियाँ भी लेकर आती है। आज भारत सहित पूरी दुनिया एक ऐसी ही चुनौती का सामना कर रही है—डिजिटल संस्कृति के सामाजिक और नैतिक प्रभाव की चुनौती। हाल ही में जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रधानमंत्री के लिए अत्यंत अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया। किसी लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन आलोचना और गाली-गलौज में स्पष्ट अंतर होता है। असहमति यदि अपनी मर्यादा खो दे, तो उसका नैतिक आधार भी कमजोर पड़ जाता है। ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर युवाओं के माता-पिता को दोषी ठहराया जाता है। निश्चित रूप से परिवार बच्चों के संस्कारों की पहली पाठशाला है, लेकिन आज के समय में किसी बच्चे का व्यक्तित्व केवल घर की चारदीवारी में नहीं बनता। उसका दूसरा और शायद अधिक प्रभावशाली शिक्षक उसकी मोबाइल स्क्रीन बन चुकी है। ओटीटी प्लेटफॉर्म, वेब सीरीज, सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और आॅनलाइन गेमिंग आज युवाओं की भाषा, सोच और व्यवहार को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं। अनेक लोकप्रिय वेब सीरीज और फिल्मों में गालियों को सामान्य संवाद शैली के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बार-बार ऐसे संवाद सुनने के बाद कुछ युवा उन्हें अपनी रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बना लेते हैं। परिणामस्वरूप सार्वजनिक मंचों पर भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग उन्हें असामान्य नहीं लगता। एक और चिंता का विषय युवाओं की बदलती जीवनशैली है। आज अनेक युवाओं का न तो सोने का समय निश्चित है और न ही जागने का। देर रात तक मोबाइल, सोशल मीडिया, गेमिंग और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहने के कारण वे अक्सर अगली तारीख शुरू होने के बाद सोते हैं। अनियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद की कमी और लगातार स्क्रीन के संपर्क में रहने से मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में कमी और आत्मसंयम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार का भी प्रश्न है। यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरी जेन-जी ऐसी है। इस पीढ़ी में असंख्य प्रतिभाशाली, नवाचारी और जिम्मेदार युवा भी हैं। लेकिन यह भी एक वास्तविक चिंता है कि समाज के एक वर्ग में नैतिक मूल्यों, आत्मसंयम, धैर्य और संवाद की मर्यादा में गिरावट महसूस की जा रही है। असहमति व्यक्त करने की जगह आक्रामक भाषा और त्वरित प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई देती है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह प्रवृत्ति सामाजिक संवाद को और अधिक कटु बना सकती है। अब प्रश्न यह है कि क्या इसकी पूरी जिम्मेदारी केवल माता-पिता की है? उत्तर है—नहीं। सरकार को ऐसे डिजिटल कंटेंट पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए, जो समाज के व्यवहार, भाषा और नैतिक वातावरण पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। यदि किसी वेब सीरीज, फिल्म या आॅनलाइन सामग्री में गाली-गलौज, अश्लील भाषा या हिंसक व्यवहार को बार-बार सामान्य और आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो विशेषकर किशोरों पर उसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए ऐसे कंटेंट के लिए अधिक प्रभावी आयु-वर्गीकरण, स्पष्ट चेतावनी, समयबद्ध निगरानी और नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। दुनिया के कई देशों ने इस दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। उदाहरण के लिए, आॅस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के उपयोग पर आयु-आधारित प्रतिबंध लागू करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य बच्चों को सोशल मीडिया के संभावित दुष्प्रभावों से बचाना है। इससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल संस्कृति का प्रश्न अब केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति का विषय भी बन चुका है। भारत में भी इस विषय पर गंभीर और संतुलित चर्चा की आवश्यकता है। माता-पिता को किन बातों के प्रति जागरूक रहना चाहिए? आज के समय में बच्चों को केवल मोबाइल दिला देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके सुरक्षित और संतुलित उपयोग की जिम्मेदारी भी अभिभावकों की है। प्रत्येक माता-पिता को यह पता होना चाहिए कि उनके बच्चे के मोबाइल में कौन-कौन से ऐप हैं, वह सोशल मीडिया पर किन लोगों के संपर्क में है, किस प्रकार का कंटेंट देख रहा है और प्रतिदिन कितना स्क्रीन टाइम बिता रहा है। अभिभावकों को मोबाइल में उपलब्ध पैरेंटल कंट्रोल, फैमिली लिंक, स्क्रीन टाइम, फैमिली सेफ़्टी, यू-ट्यूब रिस्ट्रिक्टेड मोड, गूगल प्ले, पैरेंटल कंट्रोल जैसी सुविधाओं का उपयोग करना चाहिए। इनकी सहायता से आयु के अनुरूप कंटेंट, ऐप डाउनलोड, स्क्रीन टाइम और आॅनलाइन गतिविधियों पर उचित नियंत्रण रखा जा सकता है। बच्चों के लिए घर में कुछ स्पष्ट डिजिटल नियम भी बनाए जाने चाहिएं, जैसे—रात में एक निश्चित समय के बाद मोबाइल का उपयोग बंद करना, भोजन के समय मोबाइल का प्रयोग न करना, पढ़ाई के दौरान अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद रखना तथा सोने से कम-से-कम एक घंटा पहले स्क्रीन से दूरी बनाना। माता-पिता स्वयं भी इन नियमों का पालन करें, क्योंकि बच्चे उपदेश से अधिक व्यवहार से सीखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों की जासूसी करने के बजाय उनके साथ विश्वास और संवाद का रिश्ता बनाया जाए। यदि बच्चा किसी अनुचित सामग्री, आॅनलाइन धमकी या गलत संगति का शिकार हो रहा हो, तो वह बिना डर के अपने माता-पिता से बात कर सके। डिजिटल सुरक्षा केवल तकनीकी सेटिंग्स से नहीं, बल्कि परिवार में बने विश्वास, संवाद और अच्छे संस्कारों से भी सुनिश्चित होती है। विद्यालयों और समाज की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। नैतिक शिक्षा, आत्मसंयम, संवाद कौशल, डिजिटल अनुशासन और संवैधानिक मूल्यों को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। मनोरंजन उद्योग और डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी यह समझना होगा कि उनका कंटेंट केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि समाज की भाषा और व्यवहार को भी प्रभावित करता है। तकनीक स्वयं न तो अच्छी होती है और न बुरी। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग किस प्रकार किया जाता है। इसलिए समाधान तकनीक का विरोध करना नहीं, बल्कि उसके जिम्मेदार उपयोग की संस्कृति विकसित करना है। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हमारे बच्चों के हाथ में मोबाइल है या नहीं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या मोबाइल हमारे बच्चों को चला रहा है, या हमारे बच्चे मोबाइल का विवेकपूर्ण उपयोग करना सीख रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर ही आने वाले भारत की सामाजिक और नैतिक दिशा तय करेगा।
-रणपाल सिंह, मेरठ
मो. 8881119008
डिजिटल संस्कृति का दुष्प्रभाव : सरकार की जवाबदेही और अभिभावकों की भूमिका!
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