गडरिया समाज की मिलेनिएलस जनरेशन (1980-1996) अपने जमाने में पढ़ाई से मन चुराने, गलत संगत, हुनर न सीखने, नशे में पड़ने के कारण आर्थिक रूप से कमजोर हो चुकी है जिस कारण आज के समय ये पीढ़ी आर्थिक संकट में डूब रही है।
जनसंख्या में लगातार हो रही गिरावट : इस पीढ़ी के लोग आर्थिक तंगी के कारण केवल 1 या 2 बच्चे ही पैदा कर रहे हैं ताकि उनका भरण-पोषण, पढ़ाई-लिखाई सही से करा सकें। इससे भविष्य में गडरिया समाज के पार्षद, सभासद, प्रधान, बीडीसी आदि कम होने लगेंगे। गाजियाबाद के शमशेर, मथुरापुर व हापुड़ जिले के हसनपुर आदि गाँव में गडरिया समाज अच्छी जनसंख्या होने के बावजूद प्रधानी में खड़े नहीं होते हैं, इसका कारण गरीबी व निर्बल आय है। इसी कारण इन गांवों में जाट (हसनपुर, शमशेर) व मथुरापुर (गुज्जर) जाति के व्यक्ति आसानी से ग्राम प्रधान बन जाते हैं।
मिलेनिएलस पीढ़ी नशे की आदी : गडरिया समाज की मिलेनिएलस पीढ़ी नशे की आदी पीढ़ी है। इनके इसी गुण के कारण अन्य बिरादरी के प्रत्याशी चुनावों के दौरान शराब का इस्तेमाल कर इन्हें बरगला लेती है। इनकी बिरादरी का व्यक्ति चुनाव हार जाता है व अन्य गैर बिरादरी का व्यक्ति चुनाव जीत जाता है।
निर्बल आय : मिलेनिएलस पीढ़ी का आज का ज्यादातर व्यक्ति 10-20 हजार तक ही कमा रहा है। इस आमदनी में केवल दाल-रोटी ही चल पाती है, सारे खर्चे निकालकर महीने के 2000-5000 तक ही बचा पाता है। क्या इतनी इनकम में कोई व्यक्ति चुनाव लड़ पाएगा? यही कारण है कि शमशेर व हापुड़ जिले के हसनपुर गांव में कई बार से जाट बिरादरी का व्यक्ति ग्राम प्रधान बन रहा है।
नोट : चुनाव में जीत हाशिल करने के लिए किसी भी समाज में तीन प होने चाहिएं-पॉपुलेशन(जनसंख्या), पैसा, पॉवर। जिन गांवों में हमारे गडरिया समाज में ये 3 प का सही मेल है वहां गडरिया प्रधान बनते हैं और बनते आए हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण हापुड़ जिले के रझेड़ा व सूदना गांव हैं। यहां हमारी पॉपुलेशन भी है, लोगों पर पैसा व पावर भी है। वरना कई गांवों में पॉपुलेशन तो है पर पावर व पैसा नहीं है जिस कारण वहां आज तक गडरिया समाज का ग्राम प्रधान तक नहीं बना पाया, उदाहरण के लिए ग्रेटर नोएडा का जलपुरा गांव।
दिखावे का जोर : गडरिया समाज की मिलेनिएलस पीढ़ी में दिखावे का अत्यधिक जोर है। महंगे मोबाइल, महंगी गाड़ी, महंगे कपड़े जबकि इनकी इनकम उस अनुपात में नहीं है। दिखावे के चक्कर में अपने बड़े-बुजुर्गों की जमीन-जायदाद, खेत तक बेच देते हैं। इसके अलावा शादी-ब्याह में मोटे दहेज, कार की डिमांड, कैश की डिमांड जबरदस्त है।
लालची पीढ़ी : गडरिया समाज की मिलेनिएलस पीढ़ी लालची, कामचोर, शारीरिक कमजोर, पढ़ाईचोर, जल्दी धन अर्जित करने की सोच, सुखी-नेतागिरी वाली पीढ़ी है। इसी कारण गडरिया समाज में न तो विधायक, पार्षद, सभासद बन रहे हैं और न ही कोई अच्छा बिजनेसमैन बन रहा है, बहुत कम लोग अधिकारी बन पाये हैं। इसके विपरीत गडरिया समाज की जेन-जी पीढ़ी (1997-2012) जिले स्तर पर स्कूल से लेकर सरकारी नौकरी तक में परचम लहरा रही है। हालांकि इनकी मात्रा भी कम है परंतु मिलेनिएलस पीढ़ी से अच्छी है। जनरेशन एक्स पीढ़ी (1965-1980) के लोगों ने सरकारी नौकरी में अपनी जगह बनाई थी तथा शहरों में अपनी जनसंख्या का विस्तार किया था। बेबी बुमरस पीढ़ी (1946-1964) ने कई स्थानों पर धर्मशालाएं, मंदिर आदि की स्थापनाएं करवाई थीं। हापुड़ जिले की पाल समिति धर्मशाला, खतौली-मुज्जफरनगर की पाल गडरिया धर्मशाला बेबी-बुमरस पीढ़ी के गड़रियों की ही देन हैं।
-एड. एपी सिंह नीखरा, गाजियाबाद
मो. 8766330267
आर्थिक तंगी बनी गडरिया समाज के राजनीतिक पिछड़ेपन का कारण!
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