रुमौली अपने छोटे भाई को लेकर बहुत परेशान थी। उसका बुखार जा ही नहीं रहा था। पिछले पन्द्रह-बीस दिन से भट्टी की तरह उसका जिस्म तप रहा था। रुमौली का बस चले तो वह शहर जाकर किसी बड़े अच्छे से डाक्टर को दिखाये, मगर उसके पास एक फूटी कौड़ी तक नहीं थी। बाप पिछले वर्ष कच्ची शराब पीकर मर गया और माँ तो बहुत पहले ही भाई को जन्म देकर चल बसी, उसने ही तो उसे पाला-पौसा। गाँव के वैद्य की दवा कुछ असर नहीं कर रही। दुखी रुमौली शायद यही सोचती हुई जंगल सूखी लकड़ी लेने जा रही थी कि तभी पीछे से गाँव के मंदिर के पुजारी की आवाज उसे सुनाई पड़ी- ‘ओ… रुमौली! कहाँ भागी जा रही है, तेरा छोटा भाई अब कैसा है?’ रुमौली ने पीछे मुड़कर देखा और सूखे गले से बोली- ‘कछु ठीक ना है, बुखार उतरत ही नहीं…।’ ‘मुझे तो लगता है, उसे कोई ऊपरी ब्यार (भूत-प्रेत का चक्कर) है। तू अगर चाहे तो आज रात को मंदिर में उसका इलाज कर सकता हूँ। वैसे भी आज अमावस का दिन है। इसी मुहुर्त में भूत-प्रेतों को बांधा जाता है।’ रुमौली पुजारी की बातें सुनकर एकदम से डर गई और प्रसन्न भी हुई, क्योंकि उसे पुजारी की बातों में विश्वास हो गया। उसने पूछा- ‘पर… पुजारी जी मुझे क्या करना होगा?’पुजारी (शैतानी नजरें रुमौली के जिस्म पर ऊपर से नीचे तक घुमाते हुए)-‘अरे तुझे कुछ नहीं करना है, आज आधी रात को अपने भाई को लेकर मंदिर में बगैर किसी को बताए आ जाना और हाँ इस तरह आना कि कोई देख न ले, वर्ना प्रेतों का तांडव दोगुनी ताकत से तेरे भाई पर होगा।’ रुमौली हाँ में सिर हिलाकर जंगल चली गई। ठीक आधी रात को रुमौली मंदिर पहुंच गई। पुजारी पहले से ही अपने शिकार की प्रतीक्षा कर रहा था। पुजारी ने रुमौली से भाई को मंदिर में ही छोड़ने को कहा और उसे साथ लेकर तांत्रिक क्रिया कराने नदी किनारे ले गया। नदी पर पुजारी ने तांत्रिक क्रिया के बहाने रुमौली की अस्मत लूट ली और रुमौली बेचारी जिंदा लाश बनकर सब सह गई। सुबह जब रुमौली मंदिर पहुंची तो उसे अपने छोटे भाई का जकड़ा हुआ मृत शरीर मिला। बेचारी रुमौली इतना बड़ा हृदयाघात सह न सकी और मानसिक संतुलन खो बैठी। आजकल वो गाँव में चिल्लाती-चीखती रोती-बिलखती इधर से उधर, उधर से इधर भटकती रहती है। उसके मुँह से बस इतना ही निकलता है- ‘अमावस की रात’।
-मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
गॉव-रिहावली, डाक-तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा-283111
मो. 9627912535
लघुकथा-अमावस की रात
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