Harikamaldarpan

लोड हो रहा है... लोड हो रहा है...

परंपरा और आधुनिकता के बीच समाज की युवा पीढ़ी!

आज हमारे समाज में एक ऐसा बदलाव दिखाई दे रहा है, जिस पर समय रहते गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। हमारे समाज के युवा पहले की तुलना में शिक्षा, रोजगार, आत्मनिर्भरता और अपने भविष्य को लेकर अधिक जागरूक हुए हैं। यह निश्चित रूप से अच्छी बात है। लेकिन इसी के साथ एक चिंता का विषय भी सामने आ रहा है-युवा विवाह जैसे सामाजिक और पारिवारिक संस्थान से धीरे-धीरे दूरी बनाने लगे हैं। हमें केवल युवाओं को दोष देने के बजाय यह समझना होगा कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा हो रही है। क्या विवाह आज भी युवाओं के लिए सहज और सम्मानजनक संस्था रह गया है? क्या विवाह के नाम पर बढ़ता खर्च, दिखावा, दहेज और सामाजिक प्रतिष्ठा की होड़ युवाओं को डराने लगी है? क्या परिवारों की अत्यधिक अपेक्षाएँ अच्छे रिश्तों के रास्ते में बाधा बन रही हैं? क्या हम विवाह को संस्कार से ज्यादा आर्थिक और सामाजिक प्रदर्शन बना रहे हैं? हमारे समाज में विवाह खुशी और दो परिवारों के मिलन का अवसर होना चाहिए। लेकिन यदि विवाह के साथ आर्थिक बोझ इतना बढ़ जाए कि सामान्य परिवार वर्षों तक उसका कर्ज चुकाता रहे, तो हमें अपनी व्यवस्था पर सवाल उठाना ही होगा। आज कई जगह विवाह में भोजन, सजावट, कपड़े, वाहन, बैंड-बाजा, समारोह और अन्य खर्चों को लेकर प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है। परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने के लिए मजबूर महसूस कर सकता है, क्योंकि उसे डर रहता है कि समाज क्या कहेगा। ‘लोग क्या कहेंगे?’ की यह मानसिकता कई परिवारों को आर्थिक दबाव में डाल देती है। किसी परिवार की वास्तविक खुशी इस बात से नहीं होनी चाहिए कि उसने शादी में कितने लाख रुपये खर्च किए, कितने लोगों को भोजन कराया या कितनी भव्य सजावट की। असली सफलता तब होगी जब विवाह के बाद दोनों युवा सम्मान, समझदारी और आत्मनिर्भरता के साथ अपना जीवन शुरू करें। आज का युवा यह भी देख रहा है कि शादी केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रह गई है, बल्कि कई बार इसके साथ परिवारों की अपेक्षाएँ, आर्थिक जिम्मेदारियाँ और सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ जाती हैं। एक युवा सोचता है कि पहले नौकरी मिले, अपना घर बने, आर्थिक स्थिति मजबूत हो, फिर विवाह किया जाए। दूसरी तरफ परिवार जल्दी विवाह चाहता है। इसी अंतर से तनाव पैदा होता है। हमें यह समझना होगा कि विवाह के लिए युवाओं को मजबूर करने से विवाह संस्था मजबूत नहीं होगी बल्कि युवाओं की चिंताओं को समझकर विवाह व्यवस्था को सरल और व्यावहारिक बनाना होगा। इसके साथ समाज का एक और बड़ा मुद्दा युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसरों की कमी होना चाहिए। अगर समाज के युवा अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाएँगे, आधुनिक कौशल नहीं सीख पाएँगे और रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिलेंगे, तो वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कैसे बनेंगे? हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि हमारे बच्चे शादी कब करेंगे? हमें यह भी पूछना चाहिए-हमारे बच्चे पढ़ क्या रहे हैं? उनके पास कौन-सा कौशल है? वे रोजगार या व्यवसाय के लिए कितने सक्षम हैं? समाज उनके करियर के लिए क्या कर रहा है? यही सोच समाज को आगे ले जा सकती है। युवाओं को केवल उपदेश देने से समस्या हल नहीं होगी। समाज के बुजुर्गों और युवाओं के बीच खुला संवाद होना चाहिए। युवाओं से पूछा जाए कि वे विवाह से क्यों बच रहे हैं। उनकी क्या परेशानियाँ हैं। विवाह व्यवस्था में उन्हें क्या बदलना चाहिए लगता है। वे जीवनसाथी में किन गुणों को महत्व देते हैं। वे दहेज और दिखावे के बारे में क्या सोचते हैं। वे अपने करियर और परिवार के बीच किस तरह संतुलन चाहते हैं। यदि समाज युवाओं की बात सुनेगा, तो युवा भी समाज की बात सुनेंगे।
हमें कैसी विवाह व्यवस्था चाहिए?
समाज में ऐसी विवाह व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा सकता है जिसमें-दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा न माना जाए। विवाह में अनावश्यक खर्च और दिखावे को हतोत्साहित किया जाए। सरल विवाह को सम्मान दिया जाए। लड़के और लड़की दोनों की शिक्षा को प्राथमिकता मिले। विवाह का निर्णय युवाओं की सहमति से हो। परिवार आर्थिक क्षमता से बाहर जाकर खर्च न करे। युवाओं को रोजगार और व्यवसाय के लिए प्रोत्साहित किया जाए। विवाह से पहले युवाओं के बीच समझ, जिम्मेदारी और भविष्य की योजनाओं पर बातचीत हो। समाज में ऐसे परिवारों को सम्मान मिले जो बिना दिखावे के सादगी से विवाह करते हैं। इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘हमारे युवा शादी क्यों नहीं कर रहे?’ बल्कि सवाल होना चाहिए-क्या हमने विवाह को इतना महंगा, जटिल और दिखावे वाला बना दिया है कि हमारा शिक्षित और आत्मनिर्भर युवा उससे दूरी बनाने लगा है? ‘क्या हम अपने युवाओं के भविष्य, शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता को उतनी प्राथमिकता दे रहे हैं, जितनी विवाह और सामाजिक प्रतिष्ठा को देते हैं?’ अगर समाज इन दोनों सवालों पर ईमानदारी से विचार करे, तो समस्या का समाधान केवल विवाह कराने तक सीमित नहीं रहेगा। इससे शिक्षित, आत्मनिर्भर, जिम्मेदार और मजबूत युवा पीढ़ी तैयार करने की दिशा में भी काम होगा।
- सतेंद्र पाल, टीचर और लेखक
दहेजवार, बलरामपुर (छत्तीसगढ़)
संस्थापक – येन क्लासेस
मो. 7489159834

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted

संबंधित खबरें

Scroll to Top
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x