देश के सबसे बड़े सूबे में सबसे अधिक जनसंख्या के रूप में पाई जाने वाली कौम धनगर पाल बघेल गड़रिया चरवाहा समाज की राजनैतिक भागीदारी अल्प एवं शून्य जैसी है। आखिर भागीदारी न मिलने का कारण क्या हो सकता है? जिस समाज का संगठन आजादी से पहले 1911 में अखिल भारतीय पाल महासभा के नाम से बना हो, उसके बाद देश और प्रदेश में हजारों संगठन और दर्जनभर पार्टियां बन चुकी हैं, वह सब किस काम की, केवल चुनाव आने पर हाय-तौबा मचाने और समाज को गुमराह करने या चन्दा बटोरने या अपने को स्थापित करने तक सीमित हैं या सचमुच ही समाज का भला करने या उन्हें राजनैतिक हिस्सेदारी या भागेदारी दिलाने के लिए कृतसंकल्प हैं? यह आज के दौर में चरवाहा समाज के सामने एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा हुआ है। आजादी के 79 वर्ष बीत चुके हैं, आज भी हम 3 या 4 विधायकों में ही रह जाते हैं जबकि उत्तर प्रदेश में धनगर पाल बघेल गड़रिया चरवाहा समाज की आबादी 7 से 8 परसेंट निवास करती है और अनेक ऐसी विधानसभा हैं जहां हम 25 हजार से लेकर 80 हजार तक हैं, जो राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की हैसियत रखते हैं। फिर भी हम राजनैतिक रूप से शून्य हैं, आखिर इसका कारण क्या है? हम अपनी भेड़ों को तो संगठित कर लेते हैं परंतु समाज को नहीं कर पाते। इसका मूल कारण है हमारे अहम। हम एक-दूसरे की टांग खिंचाई में ही ज्यादा उछलकूद करते रहते हैं। चंदा मिलता रहे, दाल-रोटी चलती रहे। न उन्हें समाज के उत्थान की चिंता है, न ही उसके राजनैतिक पतन की। 2 से 3 प्रतिशत की आबादी वाला समाज अपनी राजनैतिक हैसियत और जमीन तैयार कर लेता है लेकिन हमारे समाज के स्वयंभू राष्ट्रीय अध्यक्ष और उनके अंधभक्त सोशल मीडिया पर ही उछलकूद मचाते हैं और अपने आपको लाखों हैं दीवाने कहलाते हैं, जबकि जमीनी सच्चाई उन्हें भी पता है। सिर्फ चुनाव तक राजनैतिक रोटियां सेंकने, अपनी जेब भरने, समाज को गर्त में धकेलने के सिवा कुछ भी नहीं कर सकते हैं। यह जरूर करते हैं कि कोई समाज का नेता किसी भी राजनैतिक दल में अपने संघर्ष की बदौलत किसी पद तक पहुंचकर समाज के हक-हिस्सेदारी दिलाने या स्वयं को राजनैतिक रूप से मजबूत कर शासन सत्ता में भागीदारी करने का प्रयास करता है तो उसका सपोर्ट तो दूर की बात है, उसकी टांग खिंचाई करते जरूर नजर आते हैं। ये दूसरों से तो नहीं लड़ सकते, हां कुत्तों की तरह आपस में जरूर लड़ते हैं। खुद एक नहीं हो सकते, खुद एक मंच पर नहीं दिखाई पड़ सकते, समाज को एक न होने का दोषी जरूर ठहराते नजर आते हैं। बस संगठन बनाते रहो, पार्टियां बनाते रहो, समाज को गुमराह करते रहो, न कभी एक हुए हो और न कभी एक हो सकते हैं, बस अपनी डफली और अपना राग अलापने के सिवा और कुछ भी नहीं होने वाला है। हां, कुछ कम पढ़े-लिखे युवाओं को रोजगार शिक्षा से जरूर विमुख कर उन्हें अपने गुणगान के लिए युवा नेता और पदाधिकारी बनाते रहो, बस सोशल मीडिया पर राजनीति चमकाते रहो, न कोई विजन है और न कोई वजन। इसलिए समाज के युवाओं से मेरी अपील है कि आप सभी अपनी शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार पर ध्यान केंद्रित करें, आगे बढ़ें, अपने समाज के सुख-दु:ख में सम्मिलित हों, एक-दूसरे का सहयोग करें, आर्थिक कठिनाइयों से जूझने वाले होनहारों नौजवानों को आगे बढ़ाने का काम करें, यही असली समाज सेवा है, इसी से समाज का भला होगा और आपका भी। जब समाज आगे बढ़ेगा, उसे शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार मिलेगा तो वह मजबूत होगा। जब समाज मजबूत होगा तो हम सब भी मजबूत होंगे। अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करें, मंच-माला-माईक और मनी बटोरने वाले समाज के स्वयंभू शुभचिंतक बताने वाले लोगों से दूर रहें। न ये कभी एक हो सकते हैं, न इन्हें कोई एक कर सकता है, बस समाज के नाम पर चंदा और इनका धंधा चलता रहे। न ये खुद सांसद-विधायक बन पायेंगे, न तुम्हें बना पायेंगे। न इनकी नीति सही है, न नीयत। बाकी आप सभी खुद समझदार हैं।
-महेंद्र प्रसाद पाल गुरुजी
सामाजिक चिंतक और राजनैतिक विश्लेषक
मो. 8960194670
सामाजिक उत्थान से कोसों दूर नजर आ रहे हैं सामाजिक संगठन और समाज के नाम पर बन रही राजनैतिक पार्टियां!
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